महात्मा गांधी

सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह)(1930-1931, 1932-1934) 

सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह)(1930-1931, 1932-1934) 

सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह)(1930-1931, 1932-1934) –Hello दोस्तों  आज आप सभी को हम प्रतियोगी परीक्षाओं में हमेशा  पूछे जाने वाले प्रश्न आप सभी के लिए शेयर कर रहे हैं| दोस्तों महात्मा गाँधी से सम्बंधित परीक्षाओं में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं| आज हम इन्हीं से सम्बंधित कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न आप सभी के लिए शेयर कर रहे हैं इस Post में जितने भी प्रश्न है ये सभी पिछले विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछा जा चुका है|दोस्तों आज जिस topic पर हमने आप सभी के लिए यह पोस्ट तैयार किया है वह “सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह)” से सम्बंधित है| जो छात्र Competitive exams की तैयारी कर रहे हैं उन सभी के लिए हमारा यह पोस्ट बहुत ही Helpful होगा

सविनय अवज्ञा आंदोलन (नमक सत्याग्रह)

साइमन कमीशन की असफलता, ब्रिटिश सरकार द्वारा नेहरू रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करना, कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन और पूर्ण स्वाधीनता के प्रस्ताव से घटनाक्रम और भी तेज होता गया |महात्मा गांधी ने वायसराय को पत्र लिखकर 11 मांगे प्रस्तुत की|जिन्हें अस्वीकार करने पर गांधी जी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ करने का निश्चय किया गया |गांधी जी ने अहिंसात्मक आंदोलन करते हुए सरकार के प्रति असहयोग का रवैया अपनाया था इसे ही ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन‘ के नाम से पुकारते हैं |


सविनय अवज्ञा आंदोलन का कार्यक्रम

1-जगह-जगह पर नमक कानून तोड़कर नमक बनाया गया जाए|

२- सरकारी नौकरियों, अदालतों, शिक्षण संस्थानों और उपाधियों का बहिष्कार किया जाए|

३- स्त्रियां, शराब, अफीम व विदेशी कपड़ों की दुकानों पर धरना दें |

४- समस्त विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार किया जाए और उनकी होलिया जलाई जाए |

५-जनता सरकार को कर न दे|


डांडी कूच

इस कार्यक्रम के अंतर्गत गांधी जी 12 मार्च 1930 को प्रातः काल 6:30 बजे अपने 78 साथियों सहित साबरमती आश्रम से पैदल डांडी के लिए रवाना हुए 200 मील की लंबी यात्रा 24 दिन में पूरी की गई |6अप्रैल 1930 को गांधी जी ने डांडी के समुद्रतट पर नमक कानून तोड़कर नमक बनाया |


आन्दोलन की प्रगति

गांधी जी ने नमक कानून तोड़कर इस आंदोलन का सूत्रपात किया |यहां से सारे देश में सविनय अवज्ञा आंदोलन आरंभ हो गया |जिसका प्रभाव दिन प्रतिदिन बढ़ता गया |गांधी जी का अनुसरण करते हुए हजारों लोगों ने नमक कानून का उल्लंघन करते हुए स्थान स्थान पर नमक बनाया |विदेशी वस्त्रों की होलीया जलाई गई |स्त्रीयो ने पर्दा प्रथा को त्यागकर आंदोलन में भाग लिया |उन्होंने शराब की दुकानों पर धरने दिए | जिससे बहुत दुकानें बंद हो गई |किसानों ने कर चुकाने से इंकार कर दिया |इस प्रकार के सहयोग से सरकार को भारी धक्का लगा |ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए क्रूरता से काम लिया |समाचार पत्रों पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए, स्थान स्थान पर लाठी चार्ज हुए और गोलियां चली |हजारों व्यक्तियों को जेल में डाला गया | 5 मई 1930 को गांधी जी को बंदी बनाकर जेल में डाल दिया गया |जब भारत में आंदोलन चल रहा था तब ब्रिटिश सरकार ने लंदन में 1930 में प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया इसमें कांग्रेस ने भाग नहीं लिया | ब्रिटिश सरकार ने देशभर में अच्छा वातावरण बनाने के लिए गांधीजी को 1931 में जेल से रिहा कर दिया और गांधीजी और वायसराय लार्ड इरविन के बीच 5 मार्च 1931 के एक समझौता हुआ जो “गांधी इरविन समझौता” कहलाता है |

कांग्रेस की ओर से गांधी जी के आश्वासन दिया कि-

1-कांग्रेस सविनय अवज्ञा आंदोलन को स्थगित कर देगी |

२-कांग्रेस द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेगी |

-पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों के बारे में निष्पक्ष जांच की मांग छोड़ दी जाएगी |
ब्रिटिश सरकार ने 1931 में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन लंदन में आयोजित किया जिसमें कांग्रेस की ओर से गांधी जी ने भाग लिया | परंतु सम्मेलन में कोई ठोस निर्णय नहीं हो सका और गांधीजी खाली हाथ भारत लौट आए |


आंदोलन की पुनरावृत्ति (1932-1934)

गांधीजी की भारत में अनुपस्थिति से सरकार में दमनचक्र फिर से चालू कर दिया थाइसलिए गांधीजी ने भारत आते ही आंदोलन पुनः प्रारंभ कर दिया | सरकार ने दमनचक्र बहुत तेज कर दिया |कांग्रेस को गैर कानूनी संस्था घोषित कर दिया गया |गांधी जी व वल्लभ भाई पटेल के साथ लाखो व्यक्तियों को बंदी बनाया गया |देश की परिवर्तित परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए गांधी जी ने 1934 में आंदोलन समाप्त कर दिया |आंदोलन के इस प्रकार समाप्त करने से कांग्रेसी नेता बहुत क्रुद्ध हुए इतिहासकार आर सी  मजूमदार के शब्दों में- “गांधी जी द्वारा इस आंदोलन को स्थगित करना एक भारी भूल ही नहीं बल्कि एक दुखद पूर्ण घटना थी|”


यद्यपि आंदोलन असफल समाप्त हो गया, किंतु इसके दूरगामी प्रभाव हुए-

इस आंदोलन में पहली बार बहुत बड़ी संख्या में भारतीयों ने भाग लिया जिसमें मजदूर किसानों से लेकर उच्च वर्गीय लोग थे |इस आंदोलनकारियों की विशेषता यह थी कि सरकार के समस्त अत्याचारों के पश्चात भी उन्होंने अहिंसा को नहीं त्यागा |इससे भारतीयों में आत्मबल की वृद्धि हुई |इस आंदोलन में कर बंदी के कारण किसानों में भी राजनीतिक चेतना जागृत हुई |इस आंदोलन से निर्भयता, स्वावलंबन एवं बलिदान के गुण उत्पन्न हो गए जो स्वतंत्रता की नीव है |भारतीयों को अब अंग्रेजों में के वायदो और सद्भावना में विश्वास नहीं रहा  जनता के सारे वर्ग आतुरता पूर्वक स्वतंत्रता चाहते थे |इस आंदोलन में कांग्रेस की कमजोरियों को भी स्पष्ट कर दिया |कांग्रेस के पास भविष्य के लिए आर्थिक सामाजिक कार्यक्रम नहीं होने के कारण वह भारतीय जनता में व्याप्त रोष का पूर्णतया उपयोग नहीं कर सकी |कांग्रेस कार्यसमिति ने इस कमजोरी को भापकर अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए |यह एक ऐसा आंदोलन था जिसके लिए जनता में समर्पण, श्रद्धा, भक्ति और त्याग की कोई सीमा नहीं थी |सभी प्रकार के दमन के पश्चात 2 वर्ष के अंदर ही राष्ट्रीय आंदोलन पहले से अधिक वेग के साथ आगे चल पड़ा |1930 से 1934 का संघर्ष व्यर्थ नहीं गया |उसकी भट्टी तपकर जनता में एक नवीन और पहले से अधिक दृढ़ राष्ट्रीय एकता, एक नया विश्वास, एक नया गौरव उत्पन्न हुआ |

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shubham yadav

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