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पाठ्यचर्या की रूपरेखा से क्या तात्पर्य है?

पाठ्यचर्या की रूपरेखा से क्या तात्पर्य है?
पाठ्यचर्या की रूपरेखा से क्या तात्पर्य है?

पाठ्यचर्या की रूपरेखा से क्या तात्पर्य है? (What do you mean by Curriculum framework?)

पाठ्यचर्या की रूपरेखा से तात्पर्य एक ऐसे वाक्य से हे जो एक ऐसी रूपरेखा प्रस्तुत करता है जिसके अन्तर्गत शिक्षक व स्कूल उन अनुभवों का चुनाव कर सकते हैं, जो उनके अनुसार बच्चों के लिए लाभप्रद हो सकते हैं। शैक्षिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए पाठ्यचर्या की परिकल्पना ऐसी संरचना के रूप में की गई है, जो इन आवश्यक अनुभव को स्पष्ट रूप से मुखरित कर सकें। इसके लिए पाठ्यचर्या में कुछ बुनियादी प्रश्नों का उत्तर मिलना चाहिए।

(i) स्कूल किन शैक्षिक उद्देश्यों को पूरा करने की काशिश करें।

(ii) इन उद्देश्यों के लिए कौन-से शैक्षिक अनुभव कारगर होंगे?

(ii) ये शैक्षिक अनुभव किस प्रकार सार्थक रूप से नियोजित किए जा सकते हैं?

(iv) हम कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि ये शैक्षिक उद्देश्य वाकई पूरे हो रहे हैं?

इस सन्दर्भ में यदि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2000 को देखा जाये तो इसका निर्माण. विशेष रूप से बच्चे पर बढ़ते पाठ्यचर्या के बोझ की समस्या को सम्बन्धित करने के उद्देश्य से किया गया था। नब्बे के दशक की शुरुआत में मानव संसाधन विकास मंत्रालय में इस समस्या के विश्लेषण के लिए एक समिति की नियुक्ति की थी जिसमें इसके विश्लेषण के बाद पाया था कि इस समस्या की जड़ में व्यवस्था की यह प्रवृत्ति है जो सूचना को ज्ञान समझती है। इसके रिपोर्ट (शिक्षा बिना बोझ के) में समिति ने इस बात की ओर इंगित किया। कि स्कूलों में शिक्षा पढ़ाई तब तक एक आनन्दपूर्ण अनुभव नहीं हो सकता जब बच्चों के सम्बन्ध में हम अपनी इस समझ को न बदल लें कि बच्चे ज्ञान के ग्रहणकर्त्ता मात्र हैं। और पाठ्यपुस्तकें ही परीक्षा का आधार है। उनके अपने अनुभवों में जानकारी रचने की उनकी सामर्थ्य पर हमारी आस्था कम है. अतः हम उन्हें हर बात सिखाने पर तुले रहते हैं । पाठ्यपुस्तका का आकार प्रतिवर्ष बढ़ता ही जा रहा है। नए विषयों को समाहित करने का दबाव भी बढ़ रहा है और जानकारी को संश्लेषित कर उसे समग्रता में देखने का प्रयास कमजोर होता जा रहा है । मोटी-मोटी पाठ्यपुस्तकें और उनमें शामिल पाठ्यक्रम दरअसल बच्चों को, केन्द्र में रखकर उन्हें सम्बोधित करने की व्यवस्था की असफलता का प्रतीक है यह सब देखते हुए शिक्षा बिना बोडन ने पाठ्यक्रम व पाठ्यपुस्तकों की रूपरेखा में विशेष परिवर्तन लाने की सिफारिश की और इस बात की भी सिफारिश की कि समाज की इस मानसिकता में बदलाव आना चाहिए कि बच्चों पर उग्र रूप से प्रतिस्पर्द्धा बनने व असामान्य योग्यता दर्शाने का न डाला जाये।

‘राष्ट्रीय पाठ्यक्रम की रूपरेखा’ को प्रायः गलत है समझा जाता है मानो यह एकरूपता लाने के लिए प्रस्तावित दस्तावेज हो । जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NPE) 1986 और प्रोग्राम ऑफ एक्शन (POA) 1992 में स्पष्ट किया गया उद्देश्य ठीक इसके विपरीत था । एन. पी. ई. ने नवीन पाठ्यचर्या की रूपरेखा प्रस्तावित की ताकि वह ऐसी राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था के विकास का जरिया बने जिनमें यह सामर्थ्य हो कि वह भारत के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक वातावरण को दृष्टि से रखते हुए अकादमिक घटकों के साथ सामान्य आधारभूत मूल्य भी सुनिश्चित करें । इस प्रकार पाठ्यचर्या की रूपरेखा की परिकल्पना आधुनिक शिक्षा व्यवस्था के साथ के रूप में की जाती है।

यदि हम उदाहरण के रूप में 2005 की राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा को लें, तो इसकी रचना पाठ्यचर्या के दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक आधारों को पुनः सुधार हेतु की गई थी। राष्ट्रीय पाठ्य की रूपरेखा ने पाठ्यचर्या का अधिक जीवंत व सार्थक बनाने हेतु इनसे बालकेन्द्रित करने हेतु व इसे बालक के अनुभव से जोड़ते हुए कुछ ठोस सुझाव दिये थे। इसमें भारत में व्याप्त कुछ चुनौतियों जैसे सामाजिक असमानता, पर्यावरणीय ह्रास से निपटने हेतु पाठ्यचर्या में उचित परिवर्तन किये गये थे।

इस पाठ्यचर्या की रूपरेखा की शिक्षा के विविध स्तरों के लिये अनुवाद किया गया था। बाद में भी, हर कक्षा व हर विषय हेतु पाठ्यक्रम का निर्धारण किया गया था। इस प्रकार पाठ्य की रूपरेखा पाठ्यचर्या व पाठ्यवस्तु का गहन सम्बन्ध होता है जिसे नीचे दिये रेखाचित्रीय निरूपण से समझा जा सकता है।

पाठ्यचर्या की रूपरेखा

पाठ्यचर्या की रूपरेखा

पाठ्यचर्या की रूपरेखा कुछ निश्चित आधारित संकल्पनाओं पर आधारित होती है। इन्हें आन्तरिक रूप से सुदृढ़ व सभी शिक्षा के प्रति उत्तरदायी लोगों की पूर्ण सहमति मिलनी चाहिए। ये आधारित संकल्पनाएँ राष्ट्रीय फोकस समूह द्वारा चार भागों में बाँटी गई है। मानव जाति व समाज से सम्बन्धित सम्भावनाएँ जिसमें उदाहरण के रूप में इस प्रकार के वाक्य / कथन होंगे — शिक्षा का उद्देश्य न्याय, समानता व स्वतन्त्रता पर आधारित जनतंत्रीय व बहुसांस्कृतिक समाज का निर्माण करना होना चाहिए। मानव समाज से सम्बन्धित इन संकल्पनाओं में स्पष्टता होनी चाहिए। शिक्षा के उद्देश्य इन्हीं संकल्पनाओं से लिए जाने चाहिए। दूसरे प्रकार की संकल्पनाएँ ज्ञान मीमांसा से सम्बन्धित है। चूँकि ज्ञान विश्वास व कार्य को प्रभावित करता है। अतः पाठ्यचर्या की पाठ्यवस्तु सावधानीपूर्वक चुनी जानी चाहिए। परिचर्या के निर्माण हेतु ज्ञान मीमांसात्मक संकल्पनाओं के साथ ही अधिगम सम्बन्धी संकल्पनाओं का भी चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए। इसी प्रकार पाठ्यचर्या उन संकल्पनाओं पर भी आधारित होगी जो बच्चों के समझने के तरीके पर ध्यान दें। इसके लिए बच्चे के सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ को जानने की आवश्यकता पड़ेगी । एक बार यदि ये संकल्पनाएँ स्पष्टतः उल्लिखित हो जायें, पाठ्यचर्या का केन्द्रबिन्दु उभर कर आ जाता है। इस केन्द्र बिन्दु में शिक्षा के लक्ष्य उद्देश्य स्तरानुसार होते हैं जिसका बुद्धिमत्तापूर्ण चयन व संगठन किया जाता है, विषय सामग्री का संगठन, अच्छी अधिगम सामग्री का चयन व अधिगम हेतु श्रेष्ठ विधियों का चयन किया जाता है और अंत में मूल्यांकन के श्रेष्ठ सिद्धान्त चुने जाते हैं।

पाठ्यचर्या की रूपरेखा, पाठ्यचर्या के विवरण को स्थूल रूप में प्रस्तुत करती है। पाठ्यवस्तु को राज्यस्तर पर तैयार किया जाता है। पाठ्यपुस्तकों को राज्य स्तर पर तैयार किया। जाता है। शिक्षण-अधिगम सामग्री, कक्षा में प्रयुक्त प्रविधियाँ व कुछ हद तक मूल्यांकन विधियों का निर्धारण व्यक्तिगत रूप में विद्यालयों पर छोड़ दिया जाता है। इस प्रकार पाठ्यचर्या की रूपरेखा के निर्माण की प्रक्रिया राष्ट्रीयस्तर पर शुरू होती है और अंतत: कक्षा व विद्यालय पर आकर खत्म होती है।

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shubham yadav

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