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मूल्यांकन की प्रविधियां | मूल्यांकन प्रविधि के आवश्यक गुण

मूल्यांकन की प्रविधियां
मूल्यांकन की प्रविधियां

मूल्यांकन की प्रविधियां (Technique of Evaluation)

अनुसन्धानकर्त्ता विषय में सम्बन्धित कोई भी निष्कर्ष तभी निकाल सकता है, जब अध्ययन-विषय से सम्बन्धित यथार्थ तथा वास्तविक तथ्यों को संगृहीत कर ले। यह कार्य अनुमान के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए कुछ सुनिश्चित प्रविधियों की आवश्यकता होती है। अतः प्रयोगसिद्ध आधारों पर कुछ प्रविधियों का विकास किया गया है जिनकी सहायता से अनुसन्धानकर्त्ता सांख्यिकीय सामग्री को संगृहीत करने के साथ-साथ व्यवस्थित भी करता है। ये सुनिश्चित तरीके ही प्रविधि कहलाते हैं।

प्रविधि का अर्थ (Meaning of Technique)

अध्ययन-विषय से सम्बन्धित विश्वसनीय सूचनाओं तथा आँकड़ों के संकलन हेतु प्रयुक्त सुनिश्चित व सुव्यवस्थित तरीकों को प्रविधि (Technique) कहते हैं।

गुड़े तथा हॉट (Goode and Hatt) के अनुसार, “प्रविधियों के अन्तर्गत वे विशिष्ट तरीके सम्मिलित हैं जिनके द्वारा समाजशास्त्री अपने तथ्यों को अनेक तार्किक या सांख्यिकीय विश्लेषण के पूर्व एकत्रित एवं क्रमबद्ध करता है।”

उपरोक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि प्रविधियाँ अनुसन्धानकर्त्ता का वह यन्त्र हैं जिनकी सहायता से वह सांख्यिकीय सामग्री को एकत्रित एवं व्यवस्थित करता है।

मूल्यांकन प्रविधि के आवश्यक गुण (Necessary Quality of Evaluation Technique)

मूल्यांकन प्रविधि के आवश्यक गुणों का उल्लेख यहाँ संक्षेप में किया जा रहा है-

(1) विश्वसनीयता (Reliability)- जिस परीक्षा के परिणामों की विश्वसनीयता जितनी अधिक होती है उस परीक्षा को स्वयं में उतना ही निर्भर योग्य समझा जाता है। परिणामों की विश्वसनीयता का अर्थ यह है कि यदि कोई परीक्षण दुबारा, तिबारा या जितनी बार आवश्यकता पड़े, उन्हें व्यक्तियों पर प्रयोग किया जाय तो प्रत्येक बार प्रथम द्वार की भाँति वही अंकन प्राप्त हो, ऐसा नहीं होना चाहिए कि पहली बार तो 50 अंक प्राप्त हुए, दूसरी बार 40 और तीसरी बार 901 विश्वसनीयता के लिए यह आवश्यक है कि परीक्षा का परिणाम सही और एकरूपता लिए हुए हो।

(2) वैधता (Validity)- एक अच्छे परीक्षण की दूसरी विशेषता यह है कि उसमें वैधता अथवा प्रामाणिकता होनी चाहिए। “वैधता” का अर्थ यह है कि परीक्षण किया गया हो। उदाहरण के लिए किसी बुद्धि परीक्षण को तभी वैध कहा जा सकता है जबकि वास्तव में उसके द्वारा किसी व्यक्ति विशेष के बुद्धि-स्तर का सही परीक्षण किया गया हो ।

(3) वस्तुनिष्ठता (Objectivity)- किसी परीक्षण की वास्तविकता उच्च स्तर की तभी हो सकती है जबकि विभिन्न प्रश्नों में से प्रत्येक का उत्तर स्पष्ट और निश्चित हो और विभिन्न परीक्षणों के उत्तर को लेकर कोई मतभेद न हो। वस्तुनिष्ठता का तात्पर्य परीक्षण की उस विशेषता से है जिनके कारण परीक्षण के प्राप्तांकों अथवा बालकों पर परीक्षक की रुचि इत्यादि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वस्तुनिष्ठता के लिए यह आवश्यक है कि जो उत्तर दिए जायें वे निश्चित और स्पष्ट हों। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि उत्तरों के न तो बहुत अंक दिए जायें वे निश्चित और स्पष्ट हों। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि उत्तरों के न तो बहुत अंक दिए जायें और न बहुत कम ही ।

(4) प्रमाणीकरण (Standardization)- एक अच्छी बुद्धि मापक परीक्षा के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रमाणिक हो। प्रमाणीकरण का तात्पर्य परीक्षण की उस विशेषता से है जिसके अनुसार परीक्षण की विधि और उसे जाँचने का ढंग इत्यादि पहले से ही निर्धारित कर दिया गया हो। ऐसा करने से विभिन्न व्यक्तियों द्वारा प्राप्त किए गए अंकों की विभिन्न स्थानों तथा -समय पर तुलना करना सम्भव हो जाता है। यदि परीक्षण में प्रामाणिकता है तो उसमें निर्भर योग्यता एवं वैधता की विशेषतायें स्वतः आ जाती हैं। जब किसी परीक्षण का सभी प्रकार बालक-बालिकाओं पर प्रयोग किया जाता है तो उस आधार पर उनमें आवश्यक संशोधन किए जाते हैं तभी किसी परीक्षण को प्रमाणिक कहा जा सकता है। के

(5) व्यापकता (Comprehensiveness)- एक अच्छे परीक्षण के लिए उसका व्यापक होना आवश्यक है। व्यापकता का अभिप्राय परीक्षण की उस विशेषता से है जिसके अनुसार जिस योग्यता को मापने के लिए परीक्षण का निर्माण किया गया है। उसके सभी पहलुओं से सम्बन्धित प्रश्न अथवा परीक्षण के भेद निर्धारित किए जायें। दूसरे शब्दों में प्रश्नों में प्रश्नगत गुणों का समावेश तो होना ही चाहिए, साथ ही उसमें सभी सम्बन्धित गुणों का भी समावेश होना चाहिए, जिससे कि मापी जाने वाली अथवा परीक्षण की जाने वाली योग्यता का कोई पहलू छूट न जाय।

(6) व्यावहारिकता (Practicability)- परीक्षण के लिए यह भी आवश्यक है कि उसका प्रयोग सफलता एवं सरलतापूर्वक किया जा सके। अतः यह आवश्यक है कि जो प्रश्न पूछे जायें वे सरल हों, उसमें समय कम लगे और खर्चे भी मालूम हों। अतः परीक्षणों का व्यवहारिक होना आवश्यक है। जाँचने की विधि भी सुलभ होनी चाहिए।

(7) विभेदकारी शक्ति (Discriminating Power)- परीक्षणों के लिए यह आवश्यक है कि इसकी सहायता से अच्छे और कमजोर विद्यार्थियों के अन्तर की जानकारी प्राप्त की जा उसके। इसके लिए यह आवश्यक है कि ऐसे परीक्षणों में अच्छे विद्यार्थियों को अच्छे अंक मिलें और कमजोर विद्यार्थियों को कम। ऐसा नहीं होना चाहिए कि अच्छे और कमजोर दोनों ही विद्यार्थियों को समान अंक मिलें। अतः विभेदकारी शक्ति का होना एक अच्छे परीक्षण की विशेषता है। परीक्षण में ऐसे कठिन प्रश्न न हों जिन्हें केवल अच्छे विद्यार्थी ही हल कर सकें। प्रश्न सरल और ऐसे होने चाहिए जिन्हें सभी विद्यार्थी हल कर सकें । प्रश्न सरल से लेकर क्रमशः कठिनता की ओर बढ़ने चाहिए।

(8) मितव्ययिता (Economy)- अच्छे बुद्धि-परीक्षण में एक यह विशेषता भी होनी चाहिए कि उसमें खर्च अधिक न हो और उसके प्रयोग में समय भी अधिक न लगे। परीक्षण ऐसे होने चाहिए कि निर्धन देश भी अपना सकें।

(9) रोचकता (Interesting)- बुद्धि परीक्षण अपने उद्देश्य की प्राप्ति तभी कर सकता है जबकि वह रोचक हो। रोचक होने पर ही परीक्षार्थियों का ध्यान परीक्षण की ओर आकर्षित होगा और उन्हें परीक्षा देने में आनन्द आयेगा। ऐसी परीक्षा में परीक्षार्थी तथा परीक्षक दोनों ही सहर्ष सहयोग देते हैं और उसका उद्देश्य सफल होता है।

(10) व्यक्तिगत सम्पर्क (Individual Report)- ठीक-ठाक परिणाम निकालने के लिए यह आवश्यक है कि परीक्षक तथा परीक्षार्थी में उचित सम्पर्क हो। परीक्षार्थी के लिए परीक्षक का दृष्टिकोण उत्साहवर्द्धक एवं सहानुभूतिपूर्ण होना चाहिए।

(11) परीक्षा लेने का निश्चित ढंग (A Definite Procedure)- इसका अभिप्राय परीक्षा की उस विशेषता से है जिसके अनुसार प्रयोग करने का ढंग निश्चित हो। आजकल एक लघु पुस्तिका के रूप में निर्देश अंकित कर दिए जाते है।

(12) अंकन में सरलता (Easy Scoring)- बुद्धि एवं मानसिक परीक्षणों में बहुधा ऐसे प्रश्न पूछे जाते हैं जिनके उत्तरों की जाँच में काफी समय लग जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि उत्तरों को जाँचने की कोई सरल विधि अपनाई जाय। जाँचने की सरल विधि से ही अंकन में सरलता हो सकती है। यदि अंकन में सरलता होती है तो परीक्षण में किसी विशेषज्ञ की आवश्यकता नहीं होती और परिणामों में भी निर्भर योग्यता की सम्भावना हो सकती है।

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shubham yadav

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