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वृत्तिक सूचनाओं के स्त्रोत | वृत्तिक सूचना एकत्रित करने की विधियाँ

वृत्तिक सूचनाओं के स्त्रोत

वृत्तिक सूचनाओं के स्त्रोत

वृत्तिक सूचनाओं के अनेक स्रोत होते हैं। लेकिन परामर्शदाता को स्रोत की विश्वसनीयता पर अवश्य ध्यान देना चाहिये। विश्वसनीयता के साथ आवश्यक है कि सूचनाएँ नवीनतम होनी चाहिये क्योंकि वृत्ति से सम्बन्धित योग्यता, प्रशिक्षण और वेतन सम्बन्धी दशाओं में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। वृत्ति से सम्बन्धित सूचनाओं के स्रोत राजकीय प्रकाशन, व्यावसायिक संगठनों के प्रकाशन, निजी प्रकाशकों के प्रकाशन एवं फिल्म और वार्तायें हो सकती हैं। सूचना प्राप्ति के स्रोतों को दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं

1. प्रत्यक्ष स्त्रोत– वृत्ति से सम्बन्धित सूचनाएँ जब स्वयं निरीक्षण करके एकत्रित की जाती हैं तो यह प्रत्यक्ष स्रोत कहलाता है। इसमें व्यक्ति सूचना एकत्रित करने के लिये साक्षात्कार विधि का प्रयोग कर सकता है।

2. अप्रत्यक्ष स्त्रोत- इस प्रकार के स्रोतों में राजकीय और निजी प्रकाशकों के प्रकाशन, समाचार पत्र तथा फिल्म आदि सम्मिलित हैं।

अप्रत्यक्ष स्रोतों का विवरण निम्न प्रकार है-

1. शिक्षण संस्थाओं के प्रकाशन– कुछ उच्च शिक्षा की संस्थायें जैसे कॉलेज और है विश्वविद्यालय अपनी विवरणिका प्रकाशित करते हैं जिनमें उनके यहाँ चल रहे विविध पाठ्यक्रम तथा वृत्तियों में प्रवेश से पूर्व आवश्यक प्रशिक्षण से सम्बन्धित सूचनाओं का उल्लेख होता है। उदाहरण के लिये बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्देशन ब्यूरो ने अनेक वृत्तियों के परिचयात्मक विवरणिका का प्रकाशन किया है।

2. पुनर्वास तथा नियोजन निदेशालय- इस निर्देशालय के प्रकाशन में निम्नलिखित तीन प्रकाशन प्रमुख हैं-

(i) वृत्तिक पथ प्रदर्शक- निदेशालय ने अनेक वृत्तियों का परिचय देने के लिये 8-10 पृष्ठ की लघु पुस्तिकायें प्रकाशित की हैं। इनमें वृत्ति विशेष से सम्बन्धित सूचनाओं का विवरण होता है।

(ii) व्यावसायिक समीक्षा- व्यवसायों के राष्ट्रीय वर्गीकरण के आधार पर किसी विशिष्ट व्यवसाय का चित्र समीक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह सूचना कैरियर मास्टर के लिये उपयोगी होती है।

(iii) प्रशिक्षण सुविधा की पुस्तिका – इस प्रकार की पुस्तिकाओं में विविध वृत्तियों के लिये आवश्यक प्रशिक्षण सुविधा के बारे में सूचनाएँ होती हैं।

3. शैक्षिक और व्यावसायिक निर्देशन का केन्द्रीय ब्यूरो – यह ब्यूरो लघु पुस्तिका के प्रकाशन के साथ कुछ व्यवसायों के बारे में फिल्म भी तैयार करता है। इसको देखने से छात्रों को वृत्ति  का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इनसे कार्य के स्वरूप तथा कार्यस्थल की दशाओं के बारे में प्रत्यक्ष जानकारी मिलती है।

4. राज्यस्तरीय निर्देशन ब्यूरो- इनके द्वारा राज्य में स्थित व्यवसायों एवं वृत्तियों के बारे में सूचनाएँ प्रकाशित होती हैं।

5. केन्द्रीय सरकार के प्रकाशन- केन्द्र सरकार के कुछ मंत्रालय जैसे मानव संसाधन मंत्रालय और समाज कल्याण मंत्रालयों द्वारा वृत्तियों की सूचनाओं से सम्बन्धित अनेक प्रकाशन निकाले गये हैं।

6. रक्षा मंत्रालय के प्रकाशन- यह मंत्रालय अपने तीनों क्षेत्रों-थल, जल और नम में विद्यमान विविध वृत्तियों के बारे में नवयुवकों को ज्ञान कराने के उद्देश्य से सामग्री का प्रकाशन करता है।

7. औद्योगिक प्रतिष्ठान तथा व्यापारिक संस्थाओं के प्रकाशन- कुछ बड़े व्यापारिक प्रतिष्ठान भी अपने यहाँ विद्यमान वृत्तियों का परिचय करवाने के उद्देश्य से प्रकाशन करवाते हैं।

8. समाचार पत्र – कुछ प्रतिष्ठित समाचार सप्ताह में एक या दो बार एकाध वृत्तियों के बारे में सूचनाएँ प्रकाशित करते हैं। उदाहरण के लिये Times of India में बुधवार को Accent नाम से दो पृष्ठ का पृथक् से विशेषांक प्रकाशित होता है, जिसमें विज्ञापन तथा वृत्ति का परिचय दिया जाता है। इसी प्रकार राजस्थान पत्रिका नामक समाचार पत्र में रविवार को भविष्य की उड़ान नाम से दो पृष्ठ के विशेषांक में किसी-न-किसी वृत्ति का वर्णन होता है।

9. रेडियो, दूरदर्शन, इण्टरनेट, ई-मेल- आधुनिक समय में तकनीकी विकास ने व्यवसाय या वृत्ति के बारे में सूचनाएँ प्राप्त करना बड़ा सरल और सुविधाजनक कर दिया है। रेडियो या दूरदर्शन पर वृत्ति से सम्बन्धित व्यक्तियों की वार्ता का प्रसारण किया जाता है। आजकल इण्टरनेट ज्ञान का विशाल कोष बन गया है। इससे किसी भी वृत्ति के बारे में सूचनाएँ एकत्रित की जा सकती है।

10. फिल्म – यह ऐसा साधन है जो वृत्ति का प्रत्यक्ष ज्ञान करवाता है।

11. व्यावसायिक सूची पत्र- विश्व में औद्योगिक दृष्टि से विकसित राष्ट्र व्यावसायिक सूचनाओं को एकत्रित कर उन्हें व्यवस्थित रूप प्रदान करते हैं तथा उनका व्यावसायिक सूची पत्रक या रोजगार वर्गीकरण प्रकाशित करवाते हैं। इन सूची पत्रकों तथा वर्गीकरणों से विभिन्न वृत्तियों के बारे में सूचनाएँ प्राप्त हो जाती है।

वृत्तिक सूचना एकत्रित करने की विधियाँ

वृत्तिक सूचनाओं का वृत्तिक निर्देशन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। इन सूचनाओं के स्रोतों का अध्ययन हमने किया, लेकिन अब गम्भीर प्रश्न इनको एकत्रित करने का है। यहाँ उन विधियों का विवरण प्रस्तुत है जिनका उपयोग सूचनाएँ एकत्रित करने के लिये किया जा सकता है। वृत्तिक सूचनाएँ एकत्रित करने में जिन विधियों का प्रयोग प्रायः किया जाता है, वे निम्नलिखित हैं-

1. सर्वेक्षण विधि,

2. पत्राचार विधि,

3. कृत्य विश्लेषण विधि।

1. सर्वेक्षण विधि– वृत्तिक सूचनाएँ एकत्रित करने की एक विधि सर्वेक्षण भी है। इस विधि में सूचनाएँ एकत्रित करने वाला दो पद्धतियों को उपयोग में लाता है

(क) प्रश्नावली सर्वेक्षण विधि,

(ख) व्यक्तिगत सर्वेक्षण विधि।

(क) प्रश्नावली सर्वेक्षण विधि- प्रश्नावली विधि का प्रयोग अधिक लोकप्रिय है, क्योंकि समय और आर्थिक दृष्टि से यह अधिक उपयोगी है। सर्वप्रथम सूचनाएँ एकत्रित करने वाला व्यक्ति से प्रश्नावली का निर्माण करता है। प्रश्नावली निर्माण में ध्यान रखना चाहिये कि इसमें प्रश्नों की संख्या अधिक न हो और प्रश्न ऐसे हों जिनका उत्तर लम्बा न हो। इस विधि में आवश्यक है कि प्रश्नावली भरने वालों को यह विश्वास दिलाया जाये कि उनके उत्तर गोपनीय रहेंगे। साथ ही प्रश्नावली भरने वालों को निःसंकोच होकर सही तथ्य भरने के लिये अभिप्रेरित किया जाये। प्रश्नावली कर्मचारी या अधिकारियों से भरवायी जा सकती है। प्रश्नावली भरवाने की भी दो विधियाँ हो सकती हैं—

1. प्रश्नावली डाक द्वारा भेजकर डाक द्वारा वापिस मंगाना और

2. स्वयं जाकर भरवाना तथा साथ ही एकत्रित करके वापिस ले आना। डाक द्वारा मंगवाने के लिये डाक टिकट लगा लिफाफा साथ में भेजना आवश्यक है। सभी प्रश्नावलियों के उत्तर की जाँच करके सूचनाओं को व्यवस्थित रूप देना चाहिये।

(ख) व्यक्तिगत सर्वेक्षण विधि- वृत्तिक सूचनाओं को एकत्रित करने की यह उत्तम विधि है क्योंकि इस विधि से वृत्ति से सम्बन्धित सही तथ्यों का संग्रह सम्भव है। इसमें सर्वेक्षणकर्त्ता को कार्य स्थल पर जाकर कर्मचारियों तथा अधिकारियों से सम्पर्क स्थापित कर सूचना एकत्रित करनी होती है। इसमें साक्षात्कार विधि का प्रयोग होता है। सूचना संग्रह करने वाले को वे बिन्दु पहले से ही निश्चित कर लेने चाहिये जिनके बारे में उसको सूचनाओं का संग्रह करना है। इसमें सूचना संग्रहकर्ता को पहले से अधिकारियों से दिन और समय निश्चित कर लेना चाहिये। इस विधि में समय के साथ व्यय भी अधिक होता है।

2. पत्राचार विधि- यह विधि सरल और कम व्ययशील है। इसमें पत्राचार के द्वारा ब्यूरो तथा प्रतिष्ठानों से वृत्ति से सम्बन्धित प्रकाशित विवरणिकाओं को मँगवाया जा सकता है। इसके लिये से पत्राचार सम्पर्क बनाये रखना आवश्यक है।

3. कृत्य विश्लेषण – वृत्तिक सूचनाएँ एकत्रित करने की यह अधिक उपयुक्त विधि है। किसी कृत्य के सभी पक्षों से सम्बन्धित सूचनाओं या तथ्यों का विश्लेषण करना ही कृत्य विश्लेषण कहलाता है। इसके द्वारा किसी कृत्य के लिये आवश्यक योग्यताओं, ज्ञान, कौशल आदि का निर्धारण होता है। इससे कर्मचारियों के कार्य और उत्तरदायित्वों का पता लगाने में सरलता रहती है। कृत्य विश्लेषण के सम्बन्ध में प्रस्तुत पुस्तक में पृथक् अध्याय के रूप में विस्तार से प्रस्तुत किया गया है।

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shubham yadav

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