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भाषा एवं ज्ञान की रचना | Language and Construction of Knowledge in Hindi

भाषा एवं ज्ञान की रचना
भाषा एवं ज्ञान की रचना

भाषा एवं ज्ञान की रचना की विवेचना करें। (Discuss language and construction of knowledge)

ज्ञान की रचना का अभिप्राय वैसे जानने/सीखने से है। जिसमें अधिगमकर्ता अपने पूर्व ज्ञान को आधार बनाकर दूसरों के साथ सम्पर्क में रहते हुए व उनसे अंतःक्रिया करते हुए स्वयं हासिल करता है। इसमें सीखने वाला सूचना निर्माता होता है। किसी भी विचार, वस्तु या वास्तविकता का वर्णन व्यक्ति स्वयं से करता है यानि यह व्यक्तिनिष्ठ होता है। नई सूचना पूर्व ज्ञान से संबंद्ध होने के कारण भी वस्तु का वर्णन व्यक्तिनिष्ठ होता है। इस ज्ञान की रचना में सीखना एक सक्रिय प्रक्रिया है, जहाँ ज्ञान अर्जित नहीं किया जाता बल्कि इसकी रचना की जाती हैं। प्रत्येक व्यक्ति अपने अनुसार ज्ञान की रचना और व्याख्या करता है, जिसका आधार उस व्यक्ति का पूर्व अनुभव एवं सामाजिक सांस्कृतिक कारक है। इस प्रकार से ज्ञान की रचना को दो भागों में विभक्त कर देखा जा सकता है-

(i) संज्ञानात्मक रचना (Cognitive Construction)

(ii) सामाजिक रचना (Social Construction)

विकास को अवस्थाओं एवं अधिगम शैली के आधार पर कोई सीखने वाला किसी चीज को कैसे समझता है, संज्ञानात्मक रचना है। सामाजिक रचना इस बात पर बल देता है कि सामाजिक अन्तःक्रिया से अर्थ और बोध का विकास कैसे होता है।

(i) सामाजिक रचना अधिगम- भाषा अधिगम सहित सभी प्रकार के अधिगम का एक उल्लेखनीय हिस्सा दूसरों के साथ संपर्कों और अन्तःक्रिया के लिए सम्पन्न होता है। बच्चे अपने से ज्यादा अनुभवी व ज्ञानशील लोगों के साथ अपने अन्तःक्रिया के जरिए बहुत कुछ सीखते हैं। यह अधिगम (क) प्रेक्षण व नकल, (ख) दिशा-निर्देश प्राप्त करना और अनुसरण करना तथा (ग) समूह में मिलकर काम करने के जरिए चलता है। बच्चों को उनका रोजाना जोड़ों में और छोटे समूहों में काम करने के अवसर मुहैया कराना बहुत जरूरी होता है। ये जोड़े या समूह प्रदर्शन या क्षमता (जब तक कि कोई खास स्तर के हिसाब से अलग-अलग (विभेदीकृत) शिक्षण की योजना न बनाई गई हो) पर आधारित न होकर मिश्रित किस्म के होने चाहिए। जिससे बच्चे एक दूसरे से सीख सके। बच्चों को समूहों और जोड़ों में काम करने की आदत विकसित करने के लिए मार्गदर्शन एवं अभ्यास की जरूरत होती है।

(ii) संज्ञानात्मक रचना अधिगम- किसी भी तरह के सीखने में बच्चे का पूर्व ज्ञान, नए ज्ञान के लिये सहायक होती है। सीखने-सिखाने के दौरान इसी पूर्व अनुभव की मदद से शिक्षक को सहारा देने की जरूरत होती है ताकि सीखने वाला अपने स्वयं के आधार पर ज्ञान निर्माण कर सकें। शिक्षक द्वारा की जाने वाली इस सहायक क्रिया को scaffolding कहते है जबकि पूर्व ज्ञान एवं नए ज्ञान के बीच के विकास क्रम को ZPD (जोन ऑफ प्रॉक्सिमल डेवलपमेंट) कहते हैं।

ZPD के भीतर शिक्षण न तो बहुत आसान होता है और न ही बच्चे के लिए बहुत मुश्किल होता है, यह सिर्फ इतना चुनौतीपूर्ण होता है कि बच्चे अपने पास पहले से ज्ञात कौशल/अवधारणाओं के आधार पर आगे बढ़ सकते हैं। इस परिधि में बढ़ाने के लिए जरूरी है कि अध्यापक प्रत्येक बच्चे या समूह के विकास के वास्तविक स्तर से अवगत हों।

बच्चे दिन-प्रतिदिन अपनी दुनिया के नाना अनुभव साथ लेकर स्कूल में आते हैं। वे किन पेड़ों पर चढ़े, उन्होंने कौन-कौन सी चिड़िया देखीं, उन्होंने कौन-कौन से फल खाए हैं। सभी बच्चे दिन और रात, ऋतुओं, पानी, पौधों एवं पशुओं के प्राकृतिक चक्र को भली-भाँति समझते हैं। इसके बावजूद (स्कूल में) हम विरले ही इस ज्ञान को हैं जो पहले से उनके पास मौजूद है और वे रोज कक्षा में लेकर आ रहे हैं। अपने अध्यायों व अध्यापन के दौरान हम बिरले ही बच्चों से स्कूल के बाहर की दुनिया के बारे में बात सुनना चाहते करते हैं। इसकी बजाय हम पाठ्यपुस्तकों पर आश्रित होते चले जाते हैं जो कि हमारे आस-पास के प्राकृतिक जगत की एक बहुत फीकी-सी नकल भर होती है।

स्फैफोल्डिंग ज्ञान रचना के सहायक रूप में- वास्तव में बच्चों को जेडपीडी के भीतर आने वाली कोई अवधारणा या कौशल सिखाने के वास्ते विभिन्न प्रकार से सहयोग करने या सहारा देने की एक प्रक्रिया है। इसके लिए अध्यापक को बच्चों की समझ और पिछले ज्ञान के बारे में मालूम होना चाहिए ताकि वे बच्चों को जो कुछ ज्ञात है, उसके आधार पर उन्हें नया कौशल या अनुभवी अवधारणाएँ सिखा सकें।

शिक्षण-अधिगम की प्रक्रिया छोटे-छोटे कदमों में चलती है जिसमें अध्यापक या अन्य बच्चे की ओर से मार्गदर्शन व सहायता दी जाती है ताकि प्रत्येक सफलतापूर्वक पूरा हो सके।

स्कैफोल्डिंग बच्चों को जो कुछ पहले से ज्ञात है, उसके आधार पर आगे बढ़ते हुए किसी ऐसी चीज तक पहुँचने वाला एक पुल है जो उन्हें फिलहाल ज्ञात नहीं है। अगर स्कैफोल्डिंग की प्रक्रिया सही ढंग से चलायी जाए यह बच्चों के सीखने में सामर्थ्यवर्द्धक का काम करता है।

हम जानते हैं कि किसी भी कक्षा में बच्चे अलग-अलग अधिगम स्तरों पर होते हैं। आदर्श स्थिति वह होती है जब बच्चों को व्यक्तिगत अधिगम स्तर के अनुसार व्यक्तिगत स्तर पर ही स्कैफोल्डिंग मिले। फिर भी अध्यापक से न्यूनतम इतनी अपेक्षा तो की जाती है। कि वे बच्चों के पूर्व ज्ञान या कौशल के औसत को समझते हुए पूरी कक्षा के लिए कई प्रकार की स्कैफोल्डिंग तकनीकों का प्रयोग करें।

संक्षेप में, स्कैफोल्डिंग के लिए जरूरी है कि- (i) बच्चों को नियमित रूप से आकलन किया जाए ताकि उनके अधिगम स्तर को अच्छी तरह समझा जा सके।

(ii) शिक्षण को बच्चों की स्वतंत्र सामर्थ्य के वर्तमान स्तर से ठीक अगले स्तर पर केन्द्रित किया जाए (न बेहद आसान, न ही ज्यादा कठिन)।

(iii) स्कैफोल्डिंग की प्रक्रिया सभी बच्चों के लिए आवश्यक है न कि केवल ऐसे बच्चों के लिए जो कि ‘जोखिम ग्रस्त’ दिखाई पड़ रहे हैं या जो पढ़ने में दिक्कतों का सामना कर रहें है।

भाषा कक्षा में स्कैंफोल्डिंग के उदाहरण-

1. किसी विवरणात्मक पाठ (जैसे कहानी) का स्कैफोल्डिंग पठन-

आदर्श स्थिति-

पढ़ने के पहले- (i) पढ़ने का उद्देश्य तय करना ।

(ii) पाठ की एक झलक दिखाना : उसके शीर्षक / चित्रों आदि पर चर्चा।

(iii) पाठ में दी गई विषय वस्तु को पिछले ज्ञान/अनुभव से जोड़ना तथा उसके आधार पर आगे बढ़ाना; बच्चों से पूछना कि के बारे में क्या जानते हैं।

(iv) बच्चों से यह अनुमान लगाने के लिए कहना कि प्रस्तुत कहानी या पाठ किस बारे में हो सकता है और उनसे पूछना कि उनके जेहन में क्या सवाल आ रहे हैं।

(v) बच्चों को प्रस्तुत पाठ को अपने वास्तविक जीवन के अनुभवों से जोड़कर देखने के लिए मदद देना (यदि संभव हो)।

(vi) कठिन शब्दों को पहले से स्पष्ट कर देना ।

पढ़ने के दौरान-(i) बच्चों को बोल-बोलकर पाठ पढ़कर सुनाना (मॉडल पठन)।

(ii) पाठ को छोटे हिस्सों में तोड़कर पढ़ना: अर्थ पर चर्चा करना; पाठ के अगले भागों के बारे में अनुमान लगाने के लिए कहना; समृद्ध मौखिक चर्चा।

(iii) बच्चे अध्यापकीय मार्गदर्शन में जोड़ों और उप-समूहों में पढ़ते हैं।

(iv) पाठ के अर्थ की समझ की जाँच के लिए प्रश्न पूछना।

(v) कठिन शब्दों को पहले से स्पष्ट कर देना।

पढ़ने के बाद- (i) बच्चे कहानी को वापस सुनाते हैं।

(ii) बच्चे मुख्य विचार का संक्षेप में सार बताते हैं।

(iii) बच्चों को पाठ पर अपने मत व्यक्त करने और चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित करना।

(iv) पाठ की विषय वस्तु पर चित्र बनाना।

(v) कुछ प्रश्नों पर आई प्रतिक्रियाओं पर चर्चा तथा बच्चों को लिखने के लिए तैयार करना।

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shubham yadav

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