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बालक के पालन-पोषण में आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव

बालक के पालन-पोषण में आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव
बालक के पालन-पोषण में आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव

बालक के पालन-पोषण में आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव (Effects of economic environment on child rearing)

बालक के पालन-पोषण में आर्थिक परिस्थितियों के प्रभाव- द्वितीय महायुद्ध के बाद विज्ञान और तकनीक (प्रौद्योगिकी) की जो प्रगति हुई उससे सारे विश्व में बहुत बड़ी औद्योगिक क्रांति हुई। इससे परम्परागत सुसंगठित एवं शान्तिपूर्ण सामाजिक जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन आया। दैनिक जीवन में नवीन सुख-साधनों का उपयोग बढ़ जाने से अधिक धन कमाना आवश्यक हो गया। धनोत्पादन की तीव्र प्रतियोगिता के कारण तथा यांत्रिक प्रयोग और कृषि के कारण गाँवों का नाश होकर घनी बस्ती वाले शहरों का निर्माण हो गया।

औद्योगिकी परिवर्तन से समाज की कृषि प्रधान रचना टूटने के कारण बचपन व्यापक रूप से प्रभावित हुआ है। कृषि प्रधान समाज में बड़े कुटुम्ब एकत्र रूप में रहते थे। बालकों की शिक्षा घर के वृद्ध, महिला-पुरुष तथा अधिक आयु के भाई-बहनों द्वारा स्नेहपूर्ण वातावरण में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से होती रहती थी। औद्योगिक समाज में परिवार का एकत्र कुटुम्ब का विघटन हुआ। महिलाएँ भी धनार्जन करने घर से बाहर जाने लगीं। आजकल की शहरी संस्कृति के आर्थिक तनाव की स्थिति में बालकों को जीवनस्पर्शी ज्ञान उपलब्ध होना कठिन हो गया है। इसके अभाव पूर्ति हेतु कुशल संचालकों के मार्गदर्शन में जीवनस्पर्शी अनुभवों से समृद्ध बाल शालाओं का निर्माण हुआ। परिवार के विभिन्न वर्ग स्तरीय आर्थिक परिस्थितियों में बालक के पालन-पोषण के स्वरूप को निम्नलिखित प्रकार से वर्णित किया जा सकता है-

(1) मध्यम वर्ग में पालन-पोषण,

(2) धनिक वर्ग में पालन-पोषण

(3) निम्न श्रेणी और मजदूर वर्ग में पालन-पोषण।

1. मध्यम वर्ग में पालन-पोषण (Child Rearing in Middle Class) – गाँवों के परिवारों में जो मध्यमवर्गीय हैं, धन कमाने की लालसा के वशीभूत उन्हें शहरों में आना पड़ा, फलस्वरूप संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ। दिन में माता-पिता के कार्य पर चले जाने के कारण बालकों की देखभाल करने वाला कोई नहीं रहता। शहरों में स्थानाभाव के कारण खेलकूद के लिये भी सुविधाजनक स्थान की व्यवस्था नहीं है।

अतः इन बालक-बालिकाओं के विकास पर समुचित ध्यान देने के लिये पूर्व प्राथमिक विद्यालय की स्थापना परमावश्यक होने लगी। इसी समस्या के समाधान हेतु गाँवों और शहरों में शिशु-शालाओं का विकास हुआ, परंतु पर्याप्त भूमि एवं साधन सुविधाओं के अभाव में यह व्यवस्था बालकों का रक्षण मात्र कर पा रही है। बचपन के वास्तविक विकास हेतु विधिवत् पूर्व प्राथमिक विद्यालयों के संचालन की आवश्यकता है।

2. धनिक वर्ग में पालन-पोषण (Child Rearing in Highest Income Class) – बड़े-बड़े उद्योगपतियों एवं धनिक वर्गों के घरों में खेल के साधनों की विपुलता तो रहती है, देखभाल के लिये नौकर भी होता है किन्तु मर्यादित कुटुम्ब होने के कारण बालक-बालिकाओं को खेलने के लिये समवयस्क संगी-साथी नहीं मिलते। माता-पिता भी क्लब या मित्रों के घर आने-जाने में तथा अपने राग-रंग में व्यस्त रहते हैं। फलस्वरूप उनकी संतान को उनका स्नेहपूर्ण संसर्ग भी नहीं मिल पाता । बड़े-बड़े बँगले दूर-दूर होने से धनवानों के बालकों को पास-पड़ोस के बालकों से भी मिलना कठिन रहता हैं। धनवानों को अपनी प्रतिष्ठा की चिन्ता होती है इससे भी उनके बालक अन्य सामान्य समवयस्क संगी-साथियों से नहीं मिल पाते। इस प्रकार ऐसे बालकों के विकास हेतु उचित वातावरण नहीं मिल पाता। इस समस्या के समाधान हेतु कई प्रकार के विशेष नर्सरी स्कूल प्रारम्भ हो गये हैं। धनवान माँ-बाप अपने बालक-बालिकाओं को इन स्कूलों में भेजकर ही निश्चिंत हो जाते हैं परंतु ऐसे विशेष स्कूलों में उन बालकों के व्यक्तित्व का विकास भी विशेष प्रकार का ही हो पाता है।

3. निम्न श्रेणी एवं मजदूर वर्ग में पालन-पोषण (Child Rearing in Lower Class and Labour Class) – मजदूर वर्ग की बस्तियों (Slums) में माता-पिता दोनों ही काम पर जाते हैं। घर पर रहने वाले बालक-बालिकाओं को न खेलने की सुविधा होती है और न ही उनकी देखभाल करने वाला कोई रहता है। वे गलियों में इधर-उधर घूमते रहते हैं। भूख-प्यास का उन्हें कोई आभास नहीं होता है। व्यक्तित्व के विकास का प्रश्न तो यहाँ नगण्य रहता है। इन बालकों को कुछ आश्रय बालकों के लालन-पालन, खेलकूद और अल्पाहार की व्यवस्था होती है, परंतु अभी बहुत सुधार बाल विकास हेतु आवश्यक प्रतीत होते हैं।

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