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लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति | शिक्षा नीति 1904 का मूल्यांकन

लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति
लॉर्ड कर्जन की शिक्षा नीति

लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति का उल्लेख कर भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम की प्रमुख सिफारिशों पर प्रकाश डालिए ।

लार्ड कर्जन की शिक्षा नीति- सन् 1899 ई० में लार्ड कर्जन भारत का गर्वनर जनरल नियुक्त हुआ लेकिन इसके पूर्व ही वह भारत का भ्रमण कर चुका था और यहाँ की राजनीतिक व भौगौलिक परिस्थितियों से भली-भाँति परिचित था। इसलिए उसने अपने सात वर्षों के शासन काल में अनेक उल्लेखनीय कार्य किये और कदाचित् ही कोई दिन ऐसा होगा जबकि कमीशन न बैठता हो या शासन सुधार की दृष्टि से कोई कार्य न किया जाता हो। इस प्रकार भारतीय शिक्षा की दिशा में सुधार करने की ओर भी उसका ध्यान गया और तत्कालीन भारतीय शिक्षा में सुधार की आवश्यकता का अनुभव उसने किया क्योंकि देश में राष्ट्रीयता की तीव्र लहर प्रवाहित होने से कुछ सुयोग्य तथा त्यागी समाज सुधारक राष्ट्रीय शिक्षा की मांग कर रहे थे तथा उनका मत था कि केवल शिक्षा ही भारतीय संस्कृत, सभ्यता, साहित्य व भाषा का संरक्षण कर सकती है। लाहौर का दयानन्द ऐंग्लो वैदिक कॉलेज, हरिद्वार में स्वामी श्रद्धानन्द द्वारा स्थापित गुरुकुल व बनारस का सेण्ट्रल हिन्दू कालेज आदि शिक्षण संस्थाएँ मूलतः राष्ट्रीय शिक्षा का ही समर्थन कर रही थी सन् 1885 ई0 में स्थापित “इण्डियन नेशनल कांग्रेस” भारतीय स्वाधीनता के लिए आन्दोलन कर रही थी। साथ ही शिक्षा की दशा भी ठीक नहीं थी और विद्यालयों की संख्या भी कम पड़ गयी थी तथा दो भयानक दुर्भिक्षों से भी देश पीड़ित था। इस प्रकार लार्ड कर्जन का भारतीय शिक्षा की तरफ ध्यान दिया जाना स्वाभाविक था और यही कारण है कि भारत आने पर कुछ समय पश्चात उसने उत्साहपूर्वक शिक्षा कार्य को स्वयं अपने हाथ में ले लिया।

शिमला शिक्षा सम्मेलन (1901ई0) – भारतीय शिक्षा में सुधार करने की दृष्टि से सन् 1901 में लार्ड कर्जन ने अपने सभापतित्व में एक गुप्त शिक्षा सम्मेलन का आयोजन किया जिसमें भारत में सभी प्रान्तों के शिक्षा संचालकों एवं ईसाई प्रचारकों के प्रतिनिधियों को निमन्त्रित किया गया। यह सम्मेलन पंद्रह दिन तक होता रहा और इसमें भारतीय शिक्षा में प्रत्येक विषयों पर प्राथमिक शिक्षा से उच्च शिक्षा तक विचार विमर्श किया गया तथा कर्जन ने पहली बार अपनी शिक्षा-नीति की घोषणा की। इसमें निम्नांकित प्रमुख तथ्य थे –

1. अंग्रेज सरकार पहले की भाँति अभी शिक्षा से अलग नहीं होगी, शिक्षा के सभी क्षेत्रों पर उसका नियंत्रण होगा तथा हमेशा भारतीय ही शिक्षा को संचालित करते रहेंगे।

2. भारत में आवश्कतानुसार स्थान-स्थान पर सरकारी विद्यालयों की स्थापना की जायेगी जो कि देशी विद्यालयों के आदर्श स्वरूप होंगे।

3. भारतीय शिक्षा पर केन्द्रीय सरकार का पूर्व नियंत्रण होगा तथा शिक्षा नीति भी उसी के अनुसार निर्धारित व संचालित होगी।

4. अंग्रेजी सरकार शिक्षा पर अधिक धनराशि खर्च करेगी।

इस सम्मेलन की सभी कारवाइयों को गुप्त रखे जाने और भारतीयों को उचित प्रतिनिधित्व न प्राप्त होने से भारतीय जनता का रोष स्वाभाविक ही बढ़ गया। उसने इसे अपने विरूद्ध षड्यंत्र समझा। जनता ने यह अनुमान किया कि सम्भवतः सरकार भारतीयों को शिक्षा क्षेत्र से दूर रख उनकी राष्ट्रीय भावना का उन्मूलन करना चाहती है।

भारतीय विश्वविद्यालय कमीशन (1902 ई० ) नियुक्ति के कारण – शिमला शिक्षा सम्मेलन में घोषित अपनी शिक्षा नीति के अनुरूप लार्ड कर्जन ने 27 जनवरी 1902ई० को भारतीय विश्वविद्यालय कमीशन की नियुक्ति की। इस आयोग की नियुक्ति का मूल कारण स्वयं कर्जन की दृष्टि में एक आदर्श विश्वविद्यालय के दो पहलू होने चाहिए। प्रथम तो उसे ज्ञान के प्रसार व शिक्षा के प्रोत्साहन पर ध्यान देना चाहिए और द्वितीय वह ऐसी यज्ञशाला का कार्य करे जहाँ पर विद्यार्थियों का चरित्र निर्माण सम्भव हो। इस समय कलकत्ता, मद्रास व बम्बई के अतिरिक्त पंजाब व इलाहाबाद में भी विश्वविद्यालय थे लेकिन उनमें कुछ दोष भी दिखलायी पड़ते थे जिनके फलस्वरूप शिक्षा का स्तर गिर रहा था। अंग्रेज सरकार भारतीय विश्वविद्यालय को लन्दन विश्वविद्यालय का प्रतिरूप ही समझती थी पर सन् 1898 ई0 में लन्दन विश्वविद्यालय को पुनः संगठित किया गया था अतः भारतीय विश्वविद्यालय में भी परिवर्तन वांछनीय समझे जा रहे थे।

आयोग का विषय क्षेत्र- इस आयोग को निम्नांकित बातों की जाँच करनी थी।

1. ब्रिटिश भारत में स्थित विश्वविद्यालयों की दशा व उसकी भावी उन्नति की जाँच करना।

2. भारतीय विश्वविद्यालयों के संगठन व कार्य प्रणाली के सम्बन्ध में सुझाव प्रस्तुत करना ।

3. विश्वविद्यालय का स्तर उन्नत करने के लिए उन साधनों का उल्लेख करना जिससे यह कार्य शीघ्रतिशीघ्र सम्भव हो सके।

सुझाव – भारतीय विश्वविद्यालय कमीशन ने सभी विश्वविद्यालयों का भ्रमण कर लगभग 6 माह पश्चात एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें अनेक सुझाव दिये गये। हम संक्षेप में उसकी सिफारिशों को इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं।

1. विश्वविद्यालय का पुर्नसंगठन न किया जाय पर सीनेट व सिण्डीकेट का पुनर्गठन आवश्यक है। सीनेट के सदस्यों की संख्या कम कर उनकी अवधि 5 वर्ष कर दी जाय तथा सिण्डीकेट के सदस्यों की संख्या 9 से 15 तक रखी जाय।

2. विश्वविद्यालय के विधान में परिवर्तन कर उसे कुछ सीमा तक शिक्षण कार्य की भी सुविधा दी जाय।

3.  विश्वविद्यालय की सीनेटों में सम्बन्धित कॉलेजों व विश्वविद्यालयों के अध्यापकों और विद्वानों का उचित प्रतिनिधित्व होना चाहिए।

4. विश्वविद्यालय से सम्बद्ध कॉलेजों में शिक्षण की उचित व्यवस्था और उन्हें मान्यता प्रदान करने के नियमों में अधिक कड़ाई रखी जाय।

5. सम्बद्ध कॉलेजों का विश्वविद्यालयों द्वारा कक्ष निरीक्षण किया जाना चाहिए।

6. विश्वविद्यालया उच्च शिक्षा देने के लिए अध्यापकों की नियुक्ति करें।

7. विश्वविद्यालय के पाठयक्रम और परीक्षा प्रणाली में समुचित परिवर्तन करना चाहिए। 8. छात्रों के लिए छात्रावास का प्रबन्ध किया जाय।

9. विद्यार्थियों को आर्थिक दशा को देखते हुए उनके लिए छात्रवृत्ति की व्यवस्था की जाए।

10. मैट्रिक परीक्षा का स्तर ऊँचा किया जाय और इण्टरमीडिएट परीक्षा समाप्त कर बी०ए० का पाठयक्रम तीन वर्ष का कर दिया जाय।

11. प्रत्येक कॉलेज के लिए एक प्रबन्धकारिणी समिति का निर्माण किया जाय जो कि उक्त कॉलेज की व्यवस्था के साथ साथ योग्य अध्यापकों की नियुक्ति, छात्रों के अनुशासन, छात्रावास और विद्यालय भवन आदि पर ध्यान दे।

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shubham yadav

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