B.Ed./M.Ed.

विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बालकों में अध्यापक की भूमिका

विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बालकों में अध्यापक की भूमिका
विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बालकों में अध्यापक की भूमिका

विशिष्ट आवश्यकताओं वाले बालकों में अध्यापक की भूमिका का वर्णन करें। (Describe the role of teacher in specied need children.)

अध्यापक शब्द बालक के जीवन में बहुत अधिक महत्त्व रखता है। अध्यापन पेशा या व्यवसाय नहीं बल्कि समाज के प्रति सेवा के लिये समर्पण है। एक शिक्षक ही देश को स्वावलंबी बनाकर बुलंदी पर पहुँचाता है। अध्यापक ही अपने बालकों में चरित्र-निर्माण, व्यवहार आदि में परिवर्तन करके व्यक्तित्व का निर्माण करता है। बालक को सही मार्गदर्शक अध्यापक द्वारा ही सम्भव है। शिक्षा की व्यवस्था की सफलता अध्यापक पर निर्भर करती है। एक अच्छा शिक्षक ही अच्छे समाज का निर्माण कर सकता है।

डॉ. एस. राधाकृष्णन् के अनुसार – ” अध्यापक का समाज में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक संस्कृतियों और तकनीकी कौशलों को पहुँचाने में मुख्य भूमिका अदा करता है और सभ्यता के दीपक को जलाये रखता है।”

किसी भी भाग में हर प्रकार की शिक्षा का स्तम्भ अध्यापक को माना जाता है। अध्यापक हर इकाई का आधार होता है। एक योग्य अध्यापक ही सफल समावेशन में सर्वोत्तम योगदान दे सकता है कि वह निपुण एवं योग्य है। अध्यापक में अध्ययन के अलावा सामाजिकता एवं व्यावहारिकता का गुण भी होना चाहिये। समाज के एक वंचित हिस्से को सम्पन्न हिस्से में मिलाना भी अध्यापक का उत्तरदायित्व बन जाता है। शारीरिक एवं मानसिक रूप से बाधित बालकों को सक्षम बालकों में समावेशन भी एक अध्यापक का ही उत्तरदायित्व बनता है। अध्यापक का उत्तरदायित्व है कि वह कक्षा में ऐसा वातावरण उत्पन्न करे जिससे विशिष्ट बालकों के समायोजन में दिक्कत ना आये। ऐसी विशिष्ट अवस्थाओं में बालक के समावेशन के लिये अध्यापक की भूमिका को निम्न रूप से देखा जा सकता है-

(i) शिक्षक को बालक के अवांछनीय व्यहार को सहन करने की क्षमता होनी चाहिये और उसे प्रयास करना चाहिये कि इस प्रकार के बालकों में सही दृष्टिकोण का विकास करे क्योंकि अच्छे व्यवहारों का विकास अच्छे व्यवहार से ही करना सम्भव होता है और शिक्षक को धैर्यपूर्वक शिक्षा देनी चाहिये।

(ii) संवेगात्मक रूप से कमजोर बालकों के अवांछित व्यवहारों के परिणाम की शिक्षक को जानकारी होनी चाहिये। यदि वह अपने व्यवहार में अपेक्षित परिवर्तन नहीं करेंगे तो भविष्य में उन्हें इसके परिणाम भुगतने पड़ेंगे। शिक्षक को इन बालकों के अवांछित व्यवहार पर कभी-कभी दण्डित करना चाहिये और वांछित व्यवहारों को तुरंत पुनर्बलन देना चाहिये।

(iii) अध्यापक की सबसे अच्छी भूमिका यह है कि कक्षा में ऐसे बालकों के साथ सदैव अच्छा व्यवहार करे और उन्हें खुश रखने का प्रयत्न करे। यह ऐसे बालकों के उपचार की सबसे उत्तम प्रविधि मानी जाती है। अच्छे विकास के व्यवहार के लिये अच्छा व्यवहार करना ही आवश्यक होता है।

(iv) संवेगात्मक रूप से विक्षिप्त बालकों की व्यावहारिक समस्याओं की सूची शिक्षक को तैयार करनी चाहिये और यह पता लगाना चाहिये कि शिक्षा में उनकी रुचि क्यों नहीं है ? हो सकता है कि शिक्षण से उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं होती हो। इसलिये शिक्षक को अपना स्वयं का आकलन करना चाहिये और एक अच्छे परामर्शदाता के रूप में ऐसे बालकों की सहायता करनी चाहिये जिससे उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सके।

(v) सामाजिक रूप से पृथक एवं अवांछित ऐसे बालकों में उनके प्रति सामाजिकता की भावना का विकास करें।

(vi) जीवन में आने वाली विशिष्ट एवं विभिन्न स्थितियों को समझने में सहायता करें।

(vii) बालक का सर्वांगीण विकास सुनिश्चित करने के लिये उसके शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक पहलुओं की ओर ध्यान दें।

(viii) शून्य अस्वीकृति योजना को सम्पूर्ण रूप से लागू करें ताकि प्रत्येक बालक शिक्षा पा सके।

(ix) सक्षम एवं क्षमता बाधित बालकों में सकारात्मक सोच विकसित हो।

(x) सफल समावेशन के लिये अध्यापकों, अभिभावकों एवं समाज में एक सफल संयोजन स्थापित करें।

(xi) पाठ्यक्रम निर्माण में सहायता दें।

(xii) बालकों की उपलब्धि पर उन्हें पारितोषिक देकर अभिप्रेरित करें।

(xiii) बालकों से कक्षा-कक्ष में सर्वश्रेष्ठ व्यवहार सुनिश्चित करें।

(xiv) व्यक्तिपरक अनुदेशन की व्यवस्था करें।

(xv) समय-समय पर बाधित बालकों का मूल्यांकन करें।

विशिष्ट अध्यापक की भूमिका

बाधित बालकों की उन्नति एवं विकास में विशिष्ट अध्यापक का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है जिसे हम निम्न शब्दों में चिह्नित कर सकते हैं-

(i) विशिष्ट शैली से समावेशन सुनिश्चित करना।

(ii) लम्बे अन्तराल तक समावेशन की सफलता का प्रबंध करना।

(iii) बाधित बालकों की विशिष्ट आवश्यकताओं की पहचान करना।

(iv) पहचान के बाद उन क्षेत्रों में सुनियोजित ढंग से कार्य कर सफल समावेशन सुनिश्चित करना।

(v) उन बालकों की आवश्यकता पूर्ति हेतु हर प्रकार का व्यावसायिक एवं व्यावहारिक सहयोग करना।

(vi) बालक के विकास का निरंतर निरीक्षण करना।

इसी भी पढ़ें…

About the author

shubham yadav

इस वेब साईट में हम College Subjective Notes सामग्री को रोचक रूप में प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं | हमारा लक्ष्य उन छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की सभी किताबें उपलब्ध कराना है जो पैसे ना होने की वजह से इन पुस्तकों को खरीद नहीं पाते हैं और इस वजह से वे परीक्षा में असफल हो जाते हैं और अपने सपनों को पूरे नही कर पाते है, हम चाहते है कि वे सभी छात्र हमारे माध्यम से अपने सपनों को पूरा कर सकें। धन्यवाद..

Leave a Comment