इतिहास

हिटलर के उत्कर्ष के कारण-जर्मनी में हिटलर और उसके नात्सीदल के उत्कर्ष के कारण

हिटलर के उत्कर्ष के कारण-जर्मनी में हिटलर और उसके नात्सीदल के उत्कर्ष के कारण
हिटलर के उत्कर्ष के कारण-जर्मनी में हिटलर और उसके नात्सीदल के उत्कर्ष के कारण

हिटलर के उत्कर्ष के कारण-जर्मनी में हिटलर और उसके नात्सीदल के उत्कर्ष के कारण


जर्मनी में हिटलर और उसके नात्सीदल के उत्कर्ष के कारण निम्नलिखित थे.
1) आर्थिक संकट-

नात्सी पार्टी तथा हिटलर के उत्कर्ष का सबसे महत्वपूर्ण कारण आर्थिक संकट (1929-33) है विश्व-व्यापी आर्थिक संकट के समय जर्मनी की आर्थिक अवस्था बहुत खराब हो गयी थी। जून 1931 में कृषकों पर लगभग तीन अरब डालर का ऋण था। हिटलर ने कृषकों को इस ऋण से मुक्ति दिलाने का आश्वासन दिया, इससे कृषक उंसके समर्थक हो गये। छोटे-छोटे व्यापारी बड़े-बड़े स्टोर्स के कारण दु:खी थे। हिटलर ने उन्हें यह आश्वासन दिया कि बड़े-बड़े स्टोर्स का राष्ट्रीयकरण कर दिया जायेगा। इससे वे भी उसके समर्थक हो गये। बड़े-बड़े पूंजीपति साम्यवाद से डरकर हिटलर का समर्थन कर रहे थे । हिटलर ने कुछ बड़े पूंजीपतियों को उनके उद्योग-धन्धों का राष्ट्रीयकरण नहीं करने का आश्वासन दिया। 60 लाख बेकारों को कार्य देने का प्रयास किया गया। मध्यम वर्ग के जिन लोगों की आर्थिक अवस्था खराब हो गयी थी उनकी दशा सुधारने का भी प्रयास किया गया। यहूदियों को पृथक् करने से मध्यवर्ग को अनेक कार्य मिल गये अत: वे भी हिटलर के समर्थक हो गये। नात्सियों ने घोषित किया कि हम प्रत्येक आर्थिक समस्या का समाधान कर सकते हैं। इससे समाज के प्रत्येक वर्ग की सहानुभूति उनके साथ हो गयी जर्मनी में भयंकर आर्थिक संकट नहीं आता तो हिटलर तथा उसके दल का कभी भी उत्कर्ष नहीं होता।

(2) साम्यवाद का उदय-

हिटलर तथा नात्सी पार्टी के उत्कर्ष में साम्यवाद का उदय भी सहायक हुआ। नात्सियों ने अपनी स्वार्थ-पूर्ति के लिए इसका अतिशयोक्ति-पूर्ण प्रचार किया था। जर्मनी में साम्यवाद के प्रसार की कोई सम्भावना नहीं थी। 1918 में जर्मनी के पराजित होने तथा उसके सम्राट् विलियम कैसर के गद्दी छोड़कर भाग जाने के पश्चात् वहाँ
साम्यवादी व्यवस्था स्थापित हो सकती थी। उस समय साम्यवादियों ने इसके लिए प्रयास भी किया था परन्तु उनको सफलता नहीं मिली। इस पर भी जर्मनी में साम्यवादियों का प्रभाव धीरे धीरे बढ़ रहा था। साम्यवादी व्यक्तिगत पूँजी अपसिमित मात्रा में रखने के विरोधी हैं। इससे जर्मन पूँजीपतियों को साम्यवाद से बहुत भय हो गया। उन्होंने नात्सीवाद के द्वारा साम्यवाद से अपनी रक्षा का उपाय ढूँढ़ा और नात्सी पार्टी को पर्याप्त मात्रा में धन दिया।

(३) वाइमर गणतन्त्र से असन्तोष-

गणतन्त्रात्मक शासन के अन्तर्गत जर्मनी में अनेक-पार्टियों का उदय हो गया था। 1930 के निर्वाचन में 24 पार्टियों ने भाग लिया था अनेक दल होने के कारण कोई भी कार्य शीघ्र नहीं हो पाता था और बहुत समय व्यर्थ के वाद-विवाद में नष्ट हो जाता था। जर्मनी की जनता वाइमर गणतंत्र से इसलिए भी नाराज थी कि उसने वासाई की अपमानजनक तथा कठोर सन्धि को स्वीकार कर लिया था अब तक सन्धि की अनेक अपमानजनक शर्तों में परिवर्तन हो गया था, फिर भी जर्मनी पर कुछ कठोर प्रतिबन्ध लगे हुए थे डैजिग, अपर साइलेशिया तथा आस्ट्रिया के जर्मन प्रदेश उससे अलग थे। इससे जो उपनिवेश छीन लिये गये थे वे उसको वापस नहीं किये गये थे वाइमर गणतन्त्र इन माँगों को पूरा था। नहीं करा सका था; परन्तु हिटलर इनको पूरा कराने का आश्वासन दे रहा था.

(4) यहूदी-विरोधी नीति-

जर्मनी में यहूदियों की संख्या बहुत कम थी; फिर भी ये बहुत सम्पन्न तथा समृद्ध थे। ये बड़े उद्योग-धन्धों तथा समाचार-पत्रों के मालिक थे। ये अनेक उच्च पदों पर नियुक्त थे। जर्मन जनता इनसे ईर्ष्या करती थी। हिटलर ने इस भावना का लाभ उठाकर यह प्रचार करना प्रारम्भ किया कि यहूदी देशद्रोही हैं और इन्हीं के कारण 1918 में जर्मनी पराजित हुआ है। इससे हिटलर को जनता का भारी समर्थन प्राप्त हो गया।


(5) हिटलर का व्यक्तित्व तथा प्रचार-

कार्य-हिटलर का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक थी। वह एक कुशल तथा प्रभावशाली वक्ता था। उसके भाषणों का जनता पर चमत्कारिक प्रभाव होता था। वह सार्वजनिक सभाओं में अपने सिध्दान्तों को जोर दे -देकर बार-बार
दोहराता था। इससे जनता पर उसके विचारों की अमिट छाप अंकित हो जाती थी। उसका प्रचार मंत्री गोवल्स भी एक कुशल वक्ता था । उसने प्रचार के समस्त साधनों पर अधिकार कर लिया था और उनसे केवल नात्सी पार्टी के सिध्दान्तों का ही प्रचार किया जाता था ।

(6) वार्साइ की सन्धि-

वार्साइ की सन्धि पराजित जर्मनी के लिए बहुत कठोर तथा अपमानजनक थी । जर्मन देशभक्त उस पर हस्ताक्षर नहीं करना चाहते थे, परन्तु मित्र राष्ट्रो का युद्ध की धमकी से भयभीत होकर उन्हें हस्ताक्षर करने पड़े । अत: जर्मनी की जनता वार्साइ की सन्धि से बहुत असन्तुष्ट थी। हिटलर इस सन्धि का घोर विरोधी था । अत: जनता ने उसका समर्थन किया। वास्तव में इस समय तक भी जर्मन अपने राष्ट्रीय अपमान को नहीं भूले थे। अत: जर्मन जनता ने वास्साइ सन्धि के विरूद्ध विषवमन करने वाले हिटलर का पूर्ण समर्थन किया । हिटलर वार्साइ सन्धि की चर्चा करते समय तैश में आ जाता था और क्रोध में नाटकीय मुद्रा में अजीब मुद्रायें बनाने लगता था। जर्मनी की जनता को हिटलर क यह अँदाज बहुत अच्छा लगता था ।

(7) आतंकपूर्ण कार्य-

नात्सियों ने अपना प्रचार करने तथा विरोधियों के दमन के लिए आतंकपूर्ण कार्य भी किये। सरकार उनके इन कार्यों को नही रोक सकी। अत: उनका उत्साह बढ़ता गया। इस प्रकार शक्ति तथा आतंकपूर्ण कार्यों से भी उन्होंने अपना प्रचार किया।


(8) जर्मन जनता की सैनिक मनोवृत्त –

जर्मन जनता स्वभाव से ही सैन्य मनोवृत्ति रखने वाली है। वह अनुशासन-प्रिय तथा महान् फ्रेडरिक, बिस्मार्क तथा विलियम कैसर जैसे वीर नायकों की प्रशंसक थी। गणतन्त्रात्मक शासन प्रणाली उसे पसन्द नहीं थी। वह राजतंत्र को पसन्द करती थी। हिटलर में ये सब विशेषताएँ थीं। अत: जर्मन जनता ने उसका हार्दिक स्वागत किया। तत्कालीन सरकार इस प्रकवृत्ति को रोकने में विफल रही।

(9) युवकों का समर्थन-

जर्मनी में बेरोजगारी की समस्या बहुत अधिक थीं। स्कूलों तथा कालेजों से शिक्षा ग्रहण करके निकलने वाले नवयुवकों को रोजगार नहीं मिल रहे थे। इससे देश के अधिकांश नवयुवकों का भविष्य अन्धकार में था। नात्सी पार्टी उनको रोजगार देने का आश्वासन तथा अपनी पार्टी में स्थान दे रही थी। अत: उन्होंने हिटलर का समर्थन किया।


10) विपक्षियों की निर्बलता-

नात्सियों के विरोधी अनेक वर्गों में विभाजित थे। उन्होंने एकजुट होकर नात्सियों का विरोध नहीं किया। साम्यवादी यह सोचते रहे कि नात्सियों द्वारा वर्तमान सत्ता का अन्त करने पर वे शीघ्रता से देश का शासन अपने हाथ में लेंगे। सोशल डेमोक्रैटों ने हिटलर का नाममात्र विरोध भी नहीं किया। इसी प्रकार अन्य दल भी तटस्थ रहे। इस निर्बलता का लाभ उठाकर नात्सी पार्टी ने समस्त सत्ता अपने हाथों में ले ली।

(11) जर्मन परम्परा के अनुसार हिटलर के कार्य-

हिटलर के कार्य जर्मन परम्पराओं तथा आकांक्षाओं पर आधारित थे। नात्सीवाद के मौलिक सिद्धान्त भी उसने जर्मन परम्परा से लिये थे। फिख्टे ने वीर-पूजा के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया था। हीगेल ने राज्य के हित के लिए व्यक्ति के बलिदान को उचित माना था। फ्रेडरिक द्वितीय सैनिकवाद का समर्थक था नोवेलिस शक्ति को ही अधिकार मानता था। मार्वित्स यहूदी-विरोधी था। इस प्रकार हिटलर के विचार सैनिक-मनोवृत्ति-प्रधान जर्मन जाति की परम्परा तथा आकांक्षा के थे। अतः उसके इस प्रकार के विचार उसके उत्कर्ष में सहायक सिद्ध हुए।


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shubham yadav

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