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शैक्षिक निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषाएँ | शैक्षिक निर्देशन के सिद्धान्त

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषाएँ
शैक्षिक निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषाएँ

शैक्षिक निर्देशन का अर्थ एवं परिभाषाएँ (Meaning and Definitions of Educational Guidance)

शैक्षिक निर्देशन, निर्देशन सेवा का एक अति महत्त्वपूर्ण प्रकार है। यह छात्र जीवन में बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जब एक छोटा बच्चा विद्यालय में प्रवेश लेता है तो उसे घर-परिवार के वातावरण से विद्यालय का वातावरण बिल्कुल नया मिलता है। इस नए विद्यालयी वातावरण में उसे अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इन समस्याओं के कारण प्रत्येक छात्र विद्यालयी वातावरण में अपने को समायोजित करने में सक्षम नहीं हो पाता। इसलिए छात्रों के विकास हेतु अनुकूल परिस्थितियाँ एवं विकास के अवसर उत्पन्न करने के लिए तथा विद्यालयी वातावरण से सामन्जस्य स्थापित करने हेतु विद्यार्थी में योग्यता विकसित करने, जागरूकता व संवेदना उत्पन्न करने के लिए निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है। इसी निर्देशन के द्वारा वह अधिगम के निर्धारित उद्देश्यों, परिस्थितियों एवं उपकरणों आदि का चयन करने में स्वयं समक्ष बनता है। यही निर्देशन शैक्षिक निर्देशन है।

शैक्षिक निर्देशन, निर्देशन का एक ऐसा महत्त्वपूर्ण प्रकार है जो विशुद्ध रूप से शैक्षिक समस्याओं तक सीमित माना जाता है लेकिन व्यावहारिक परिस्थितियों में ऐसा सम्भव नहीं हो पाता है। जब छात्र माध्यमिक स्तर की शिक्षा में प्रवेश लेता है तब वह पाठ्यक्रमों का चयन भावी व्यावसायिक अवसरों को ध्यान में रखकर करता है। शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य जीविकोपार्जन है एवं छात्रों का एक बड़ा भाग इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर शिक्षा प्राप्त करता है। इस प्रकार शैक्षिक निर्देशन व्यावसायिक निर्देशन को छूता हुआ चलता शिक्षा बालक के सर्वांगीण विकास पर ध्यान देती है। इस स्थिति में छात्र की व्यक्तिगत समस्याओं से सम्बन्धित निर्देशन शैक्षिक निर्देशन की सीमा के अन्तर्गत आ जाता है। इस प्रकार शैक्षिक प्रदान करते समय व्यावसायिक एवं व्यक्तिगत दोनों प्रकार की निर्देशन की प्रक्रियाएँ भी चलती रहती हैं।

शैक्षिक निर्देशन को अनेक विद्वानों ने परिभाषित किया है। कुछ विद्वानों द्वारा दी गई परिभाषाएँ इस प्रकार हैं-

जी. ई. मायर्स के अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन विद्यार्थी के विकास या शिक्षा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ उत्पन्न करने हेतु विद्यार्थी के विभिन्न गुणों, विशेषताओं एवं विकास के अवसरों और आवश्यकताओं के विभिन्न समूहों के बीच सम्बन्ध स्थापित करने वाली प्रक्रिया है।”

According to G. E. Meyers, “Educational guidance is a process concerned with bringing about between an individual pupil with his distinctive characteristics on the one hand and differing groups of opportunities and requirements on the other, a favourable setting for the individuals development on education.”

जोंस के अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन का सम्बन्ध विद्यार्थियों को प्रदान की जाने वाली उस सहायता से है जो उन्हें विद्यालय, पाठ्यचर्या / पाठ्यक्रम एवं विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित चयन एवं समायोजन के लिए अपेक्षित है।”

According to Arthur J. Jones, “Educational guidance is concerned assistance given to pupils in their chances and adjustment with relation to school, curriculum, courses and school life.”

ब्रेवर के अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन को व्यक्ति के बौद्धिक विकास में सहायता प्रदान करने के सचेतन प्रयास के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। शिक्षण या अधिगम के लिए किए गए सभी प्रयास या क्रियाएँ शैक्षिक निर्देशन के अन्तर्गत माने जा सकते हैं। “

According to Braver, “Educational guidance may be defined as conscious effort to assist in the intellectual growth of an individual anything that has to do with instruction or with learning may come under the term educational guidance.”

ब्रेवर उसके उद्देश्य का बोध कराने वाले रूथस्ट्रांग ने शैक्षिक निर्देशन को शब्दों के रूप में परिभाषित किया है। उनके अनुसार, “शैक्षिक निर्देशन का उद्देश्य व्यक्ति विशेष को उपयुक्त कार्यक्रम का चयन एवं उसमें प्रगति करने में सहायता देना है।”

According to Ruth Strang, “Educational guidance is intended to aid the individual in choosing an appropriate programme and in making progress in it.”

उपरोक्त वर्णित परिभाषाओं से स्पष्ट है कि शैक्षिक निर्देशन छात्र को प्रदत्त वह सहायता है जिसके द्वारा वह विद्यालयी वातावरण में समायोजन स्थापित करता है, विद्यालयी जीवन से सम्बन्धित समस्याओं का निराकरण करता है, उपयुक्त भावी कार्यक्रमों का चयन करने में सक्षम बनता है एवं वांछित प्रगति करते हुए निर्धारित उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होता है।

शैक्षिक निर्देशन के सिद्धान्त (Principles of Educational Guidance)

शैक्षिक निर्देशन के सिद्धान्त नियमों के वे सामान्यीकरण (Generalisation) हैं जिनका शैक्षिक निर्देशन द्वारा छात्रों को सहायता प्रदान करते समय ध्यान रखा जाता है। यदि इन सिद्धान्तों को ध्यान में नहीं रखा जाए तो शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया को संचालित नहीं किया जा सकता है।

शैक्षिक निर्देशन की प्रक्रिया को संचालित करने के लिए निम्न सिद्धान्तों का अनुपालन करना चाहिए-

(1) सभी छात्रों के लिए निर्देशन का सिद्धान्त (Principle of Guidance for Al Students)- शैक्षिक निर्देशन कुछ विद्यार्थियों के चयनित समूह विशेष के लिए न होना चाहिए बल्कि यह सेवा सभी विद्यार्थियों को मिलनी चाहिए। जब तक निर्देशन सेवा सभी को उपलब्ध नहीं होगी, इसका उददेश्य पूर्ण नहीं होगा। विद्यालयी स्तर पर जहाँ निर्देशन सेवाएँ उपलब्ध हैं ध्यान रखना चाहिए कि निर्देशन सेवा प्राप्त करने से कोई विद्यार्थी वंचित न रहे।

(2) प्रारम्भिक स्तर पर ही समस्या समाधान का सिद्धान्त (Principle of Problem Solving at Initial Level) – यदि किसी विद्यार्थी को कोई समस्या महसूस होती है। तो उस समस्या का समाधान निर्देशन सेवा द्वारा तुरन्त करना चाहिए क्योंकि समस्या गम्भीर हो जाने पर निर्देशन सेवा उतनी प्रभावशाली नहीं सिद्ध होती है।

(3) विद्यालय एवं अभिभावकों के मध्य गहन सम्बन्ध का सिद्धान्त (Principle of Deep Relationship Between School and Guardians/Parents)- निर्देशन प्रक्रिया में विद्यार्थियों के माता-पिता/अभिभावकों की बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। विद्यार्थियों के विषय में बहुत सी वांछित सूचनाएँ उनके माता-पिता / अभिभावक से ही प्राप्त हो सकती है। विद्यालय एवं विद्यार्थियों के माता-पिता / अभिभावकों में बहुत अच्छे सम्बन्ध होने चाहिए तभी निर्देशन प्रक्रिया अपने उद्देश्यों को प्राप्त कर पाने सफल हो सकती है।

(4) प्रमाणीकृत परीक्षणों के प्रयुक्त किए जाने का सिद्धान्त (Principle of Using Standardised Tests)- विद्यार्थियों के विद्यालय में प्रवेश से लेकर अन्य सम्बन्धित समस्याओं हेतु प्रमाणीकृत परीक्षणों का प्रयोग करना चाहिए। इन परीक्षणों के आधार पर विद्यार्थी के बारे में भविष्य कथन किया जा सकता है।

(5) सम्बन्धित समुचित सूचनाओं के संकलन का सिद्धान्त (Principle of Collecting Proper and Relevant Informations)- किसी भी प्रकार की निर्देशन के संचालन के लिए समुचित सम्बन्धित सूचनाओं का होना अति आवश्यक है। सम्बन्धित सूचनाओं के संकलन के अभाव में शैक्षिक एवं व्यावसायिक निर्देशन सेवा प्रदान करना सम्भव नहीं हो सकता। निर्देशन सेवा सफलतापूर्वक प्रदान करने के लिए पर्याप्त सम्बन्धित सूचनाओं का संकलन आवश्यक है।

(6) अनुवर्ती अध्ययन का सिद्धान्त (Principle of Guidance Follow-up Study) – शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने के पश्चात् यह जानना अति आवश्यक होता है कि निर्देशन सेवा किस सीमा तक सफल हुई। शैक्षिक निर्देशन की सफलता को जाँचना एक अनिवार्यता है। इसी के माध्यम से निर्देशन सेवा की प्रभावशीलता का पता चलता है। अतः शैक्षिक निर्देशन प्रदान करने के पश्चात् उसकी सफलता या प्रभावशीलता को समय-समय पर अवश्य जाँच लिया जाना चाहिए। इसी को अनुवर्ती अध्ययन (Follow-up Study) कहा जाता है।

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