B.Ed./M.Ed.

वृत्तिक निर्देशन का अर्थ, परिभाषा, आवश्यकता एवं उद्देश्य | वृत्तिक निर्देशन की विधियाँ

वृत्तिक निर्देशन का अर्थ
वृत्तिक निर्देशन का अर्थ

वृत्तिक निर्देशन का अर्थ और परिभाषा

भारत ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण विश्व में अतीत काल में पैतृक रूप में व्यवसाय आगे आने वाली पीढ़ी को पैतृक धरोहर के रूप में प्राप्त होता था। बालक अपने पिता के उस कार्य में पिता से प्रशिक्षण प्राप्त करके उसी कार्य को अपनी वृत्ति बना लेता था। इसके साथ ही उस समय सीमित और जीवनयापन सम्बन्धी सरल आवश्यकताओं के कारण वृत्तियों की संख्या भी सीमित थी। लेकिन आज सामाजिक, आर्थिक एवं वैज्ञानिक परिवर्तनों ने उद्योगों, स्वास्थ्य सेवाओं, न्यायिक व्यवस्था आदि में विविध व्यवसायों तथा इन व्यवसायों में विविध वृत्तियों तथा नौकरियों को जन्म दिया है कि बालक ही नहीं, अपितु उनके माता-पिता भी अचम्भित होकर यह निर्णय लेने में अपने को असमर्थ पाते हैं कि कौन-सी वृत्ति उनके बालक के लिये उपयुक्त है। पहले की अपेक्षा आज युवक वृत्ति के चयन के प्रति अधिक सजग हो गया है। उसकी इच्छा होती है कि उसकी रुचि, योग्यता और क्षमता के अनुकूल वृत्ति में चयन हो, जहाँ भविष्य में वह प्रगति कर मानसिक सन्तोष प्राप्त कर सके। इस कार्य में निर्देशन ही उसका सहायक हो सकता है।

वृत्तिक निर्देशन को समझने के लिये आवश्यक है कि कुछ विद्वानों द्वारा दी गयीं परिभाषाओं पर विचार किया जाये।

यद्यपि वृत्तिक निर्देशन शब्द को सर्वप्रथम प्रयोग फ्रेंक पारसन द्वारा किया गया, लेकिन उन्होंने इस शब्द को परिभाषित करने का प्रयास नहीं किया। मायर महोदय ने वृत्तिक निर्देशन को परिभाषित करते हुये लिखा है—“वृत्तिक निर्देशन ऐसी प्रक्रिया है जिसका उद्देश्य व्यक्ति की वृत्ति चयन तथा उसकी क्रियाओं में भली-भाँति समायोजित होकर उनको प्रभावशाली ढंग से करने में सहायता करना है।”

डोनाल्ड सुपर ने वृत्तिक निर्देशन को इस प्रकार परिभाषित किया है, “वृत्तिक निर्देशन एक बालक को सहायता प्रदान करने की ऐसी प्रक्रिया है जिससे वह ऐसा रोजगार प्राप्त कर सके जिसमें अपना विकास करते हुये सन्तोष प्राप्त कर सके और अपनी शक्ति और योग्यताओं का प्रभावी उपयोग करते हुये राष्ट्र के आर्थिक विकास में सहयोग प्रदान कर सके।”

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने सन् 1949 में वृत्तिक निर्देशन को इस प्रकार परिभाषित किया— “वृत्तिक निर्देशन वृत्ति के चयन से सम्बन्धित समस्या के समाधान और व्यक्ति के गुणों और उनके व्यावसायिक अवसरों के सन्दर्भ में प्रगति करने में सहायता करना है।” क्रो और क्रो ने लिखा है कि “वृत्तिक निर्देशन से आशय छात्र की रोजगार के चयन तथा उसमें

प्रवेश की तैयारी में सहायता करने से है ताकि वह अपना जीवन अच्छी तरह व्यतीत कर सके।” उपर्युक्त परिभाषाओं के विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि वृत्तिक निर्देशन छात्र की रुचि, क्षमता तथा योग्यता के अनुरूप किसी वृत्ति में चयन करने, प्रवेश करने, प्रगति करने में सहायता करना है ताकि वह उसमें समायोजित होकर आनन्दपूर्वक जीवन व्यतीत करते हुये राष्ट्र के सामाजिक आर्थिक विकास में सक्रिय योगदान कर सके।

वृत्तिक निर्देशन की आवश्यकता

आज वृत्तिक निर्देशन की आवश्यकता निम्न कारणों से अधिक बढ़ गयी है—

1. वैयक्तिक भिन्नतायें – शारीरिक और मानसिक गुणों के आधार पर कोई भी दो व्यक्ति समान नहीं होते हैं। अतः स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति किसी भी वृत्ति के लिये उपयुक्त नहीं होता है। व्यक्ति को गुणों के उपयुक्त वृत्ति के चयन में वृत्तिक निर्देशन आवश्यक है।

2. मानव संसाधन का उपयुक्त उपयोग- गलत वृत्ति में प्रवेश करने पर व्यक्ति की क्षमता तथा योग्यता का अपव्यय होता है। मानव संसाधन का सही उपयोग करने के लिये वृत्तिक निर्देशन आवश्यक है।

3. वृत्ति विकल्पों में वृद्धि – आज वृत्तियों की संख्या में वृद्धि के कारण वृत्ति चयन में छात्रों को कठिनाई का सामना करना पड़ता है। वृत्ति सम्बन्धी विकल्पों में से छात्र चयन करने में वृत्तिक निर्देशन की सहायता आवश्यक हो गयी है। अपने उपयुक्त विकल्प

4. वृत्तियों में विशिष्टीकरण की प्रवृत्ति में वृद्धि- आज वृत्तियों में बढ़ रही विशिष्टीकरण की प्रवृत्ति ने विशेष प्रशिक्षण की माँग में वृद्धि की है। किसी वृत्ति में प्रवेश के लिये विशेष शिक्षा प्राप्त करने की जानकारी वृत्तिक निर्देशन द्वारा ही उपलब्ध हो सकती है।

5. सन्तोषप्रद समायोजन- रुचि तथा योग्यता के अनुकूल वृत्ति में प्रवेश सम्बन्धी सहायता  प्रदान कर वृत्तिक निर्देशन व्यक्ति के सन्तोषप्रद समायोजन में अप्रत्यक्ष रूप में सहायता प्रदान करता है।

6. समस्यात्मक बालकों में सुधार- विद्यालय में किशोर बालकों की आवश्यकताओं की में उपेक्षा होने पर वे अनुशासनहीनता में लिप्त हो जाते हैं या विद्यालय जीवन की मुख्य धारा से पथभ्रष्ट हो जाते हैं। ऐसे छात्रों में वृत्तिक निर्देशन द्वारा उनकी शक्ति को रचनात्मक कार्यों की ओर मोड़कर रोजगार के प्रति जागरूकता पैदा की जा सकती है।

वृत्तिक निर्देशन के उद्देश्य

वृत्तिक निर्देशन के उद्देश्य निम्नलिखित हैं-

1. छात्रों को विभिन्न वृत्तियों से परिचित कराने के उद्देश्य से वृत्तियों से सम्बन्धित सूचनाएँ उपलब्ध करवाने में उनकी सहायता करना।

2. छात्रों को उन संस्थाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायता करना जो विभिन्न वृत्तियों में प्रवेश के लिये प्रशिक्षण प्रदान करती हैं।

3. किसी वृत्ति के लिये आवश्यक गुण, शैक्षिक योग्यता, शारीरिक गुण, मानसिक गुणों का छात्रों को ज्ञान कराना।

4. छात्रों को वृत्ति से सम्बन्धित अवसरों (Opportunities) का ज्ञान कराना।

5. विभिन्न वृत्तियों के स्थल पर छात्रों को ले जाकर प्रत्यक्ष में कार्य के रूप तथा कार्यस्थल की दशाओं से परिचित होने में छात्रों की सहायता करना ।

6. छात्रों को आत्म-विश्लेषण और वृत्ति सम्बन्धी सूचनाओं के विश्लेषण के योग्य बनाना।

7. छात्रों में ऐसी क्षमता का विकास करना कि वे वृत्ति में कार्य करते हुये कुसमायोजन से बच सकें।

वृत्तिक निर्देशन की विधियाँ

वृत्तिक निर्देशन में अनेक विधियों का प्रयोग किया जा सकता है। यहाँ कुछ विधियों का विवरण प्रस्तुत है—

1. वृत्तिक शिक्षा- इसके भी दो रूप हो सकते हैं- प्रथम रूप में प्रत्येक विषय का अध्यापक अपने विषय का शिक्षण करते समय उन वृत्तियों की जानकारी छात्रों को दे सकता है जो उस विषय से सम्बन्धित है। दूसरे विद्यालय के समय-चक्र में सप्ताह में प्रत्येक कक्षा के लिये एक कालांश का प्रावधान हो, जिसमें कैरियर मास्टर छात्रों को विभिन्न व्यवसायों से परिचित कराये तथा उनमें प्रवेश के लिये आवश्यक योग्यता तथा प्रवेश की विधि समझाये। इससे छात्र को व्यवसाय के चयन में सुविधा होगी।

2. वृत्तिक वार्ता तथा वृत्तिक सम्मेलन का आयोजन- वृत्तिक निर्देशन भी एक विधि वृत्तिक वार्ता और वृत्तिक सम्मेलन का आयोजन करना है। यह निर्देशन की सामूहिक विधि है। वृत्तिक वार्ता का आयोजन विद्यालयों और महाविद्यालयों में किया जाता है। इसमें वृत्ति के विशेषज्ञ को आमंत्रित किया जाता है और वह अपनी वार्ता के माध्यम से अपनी वृत्ति का पूरा परिचय छात्रों को करवाता है।

वृत्तिक सम्मेलन का आयोजन सत्र के आरम्भ में होता है। इसमें विभिन्न वृत्तियों के विशेषज्ञ भाग लेते हैं जो अपनी-अपनी वृत्ति की जानकारी और प्रशिक्षण साधनों का ज्ञान कराते हैं। इस प्रकार के सम्मेलन में छात्रों के अभिभावकों को भी बुलाया जाता है ताकि वृत्तियों की जानकारी उनको भी हो सके।

3. वृत्तिक प्रदर्शनी– छात्रों को वृत्तिक निर्देशन के लिये वृत्तियों के बारे में जानकारी देने के लिये वृत्तिक प्रदर्शनी का आयोजन भी एक उत्तम विधि है। इसमें विविध वृत्तियों से सम्बन्धित साहित्य का प्रदर्शन होता है जिसका अध्ययन कर छात्र वृत्ति के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

4. वृत्तिक निर्देशन – इसमें छात्रों को आत्मानुभूति कराकर उनके उपयुक्त वृत्ति का चयन करने में सहायता दी जाती है। छात्र स्वयं वृत्ति की अपेक्षायें और अपने गुणों में मिलान करके उचित निर्णय लेता है।

इसी भी पढ़ें…

About the author

shubham yadav

इस वेब साईट में हम College Subjective Notes सामग्री को रोचक रूप में प्रकट करने की कोशिश कर रहे हैं | हमारा लक्ष्य उन छात्रों को प्रतियोगी परीक्षाओं की सभी किताबें उपलब्ध कराना है जो पैसे ना होने की वजह से इन पुस्तकों को खरीद नहीं पाते हैं और इस वजह से वे परीक्षा में असफल हो जाते हैं और अपने सपनों को पूरे नही कर पाते है, हम चाहते है कि वे सभी छात्र हमारे माध्यम से अपने सपनों को पूरा कर सकें। धन्यवाद..

Leave a Comment