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सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख चरण | Stages of Social Survey in Hindi

सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख चरण | Stages of Social Survey in Hindi
सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख चरण | Stages of Social Survey in Hindi

सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख चरण

सामाजिक सर्वेक्षण के प्रमुख चरण – सामाजिक सर्वेक्षण के अन्तर्गत आने वाली प्रमुख अवस्थाओं अथवा चरणों को इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-

1. समस्या का चुनाव

विषय का चुनाव सामाजिक सर्वेक्षण का एक महत्वपूर्ण कार्य है। सामाजिक सर्वेक्षण के आयोजन में सबसे प्रथम चरण उस समस्या का चयन करना है जिस पर सर्वेक्षण करना है। इसलिये विषय का चुनाव करते समय बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है। यदि समस्या का चुनाव गलत ढंग से होता है तो सर्वेक्षणकर्ता को आगे प्रत्येक पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इस रूप से सम्पूर्ण सर्वेक्षण, समस्या के चुनाव पर आधारित है। विषय का चुनाव करते समय निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है –

‘(i) अध्ययनकर्ता की रुचि,

(ii) पूर्व ज्ञान से सम्बन्ध

(iii) साधन सीमा के अन्तर्गत

(iv) उपयोगिता ।

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2. उद्देश्य निर्धारण

समस्या के चुनाव के पश्चात् एकदम ही सर्वेक्षण कार्य प्रारम्भ नहीं कर दिया जाता है बल्कि विषय के चुनाव के पश्चात् यह आवश्यक हो जाता है कि सर्वेक्षण के उद्देश्य को भी निश्चित कर लिया जाये। जब तक सर्वेक्षण का उद्देश्य निश्चित नहीं होता तब तक इससे सम्बन्धित अन्य बातें जैसे- सर्वेक्षण की प्रकृति, उसका क्षेत्र, अवधि आदि जोकि उस पर निर्भर है, निश्चित नहीं की जा सकती। उद्देश्य स्पष्ट होने से सूचना एकत्रित करने में सहायता मिलती है तथा सर्वेक्षण की प्ररचना बनाने में सुविधा हो जाती है और संग्रहकर्त्ता तथ्यों के संकलन के समय उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों का हल आसानी से निकाल सकता है।

3. अध्ययन क्षेत्र का निर्धारण

समस्या के चुनाव तथा उद्देश्य को निर्धारित करने के बाद सर्वेक्षणकर्ता को उस स्थान का निर्धारण करना होता है जिसमें समस्या का अध्ययन किया जायेगा। जिस स्थान, समुदाय व समूह में अध्ययन करना है उसका पूर्वानुमान करने से सर्वेक्षण केन्द्रित हो जाता है और सर्वेक्षण कार्य के भटक जाने की सम्भावना नहीं होती और निष्कर्षो में यथार्थता पनपती है। क्षेत्र का निर्धारण करते समय स्थान की दूरी, जनसंख्या समस्या का प्रसार तथा प्राप्त सुविधाएँ और सर्वेक्षणकर्ताओं का क्षेत्र के बारे में पूर्वज्ञान इत्यादि बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

4. प्रारम्भिक अध्ययन 

वास्तविक सर्वेक्षण प्राप्त करने से पूर्व समस्या पर इस प्रकार का अध्ययन कर लेना आवश्यक है। समस्या के चुनाव करने व उसे स्पष्ट एवं परिभाषित करने के पश्चात वास्तविक सामग्री के संकलन से पूर्व सर्वेक्षणकर्त्ता को सम्बन्धित विषय पर विस्तृत एवं गहरा अध्ययन करना पड़ता है। अन्य सर्वेक्षणकर्त्ताओं द्वारा किए गए सर्वेक्षणों द्वारा समस्या से सम्बन्धित प्राप्त निष्कर्ष अथवा परिणाम तथा उनमें अपनायी गई प्रणालियों तथा पद्धतियों का ज्ञान सर्वेक्षण कार्य को सुगम बना देता है।

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5. सर्वेक्षण आयोजन समिति का निर्माण

सर्वेक्षण कार्य का संचालन सुचारू रूप में करने के लिये एक सर्वेक्षण आयोजन समिति का निर्माण किया जाता है। इसका उद्देश्य सर्वेक्षण कार्य के अनेकानेक हितों का निर्धारण, संचालन तथा नियन्त्रण करना है। यह समिति वास्तविक विभाग या सरकार से सम्बन्ध स्थापित करके सर्वेक्षण के प्रारम्भ से अन्त तक सभी कार्यों की जिम्मेदारी अपने ऊपर लेती है। इस समिति में एक सर्वेक्षण निर्देशक प्रमुख सर्वेक्षक तथा अन्य विभाग के कई प्रतिनिधि भी होते हैं।

6. बजट का निर्माण

सर्वेक्षण के लिये बजट का निर्माण अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि प्रत्येक सर्वेक्षण में पर्याप्त धन की आवश्यकता होती है। किसी भी सर्वेक्षण के लिये कितना धन व्यय होगा, यह सर्वेक्षण का क्षेत्र, प्रकृति, सूचना प्राप्ति के साधन तथा उपलब्ध समाज आदि पर निर्भर होता है।

7. समय-सूची का निर्माण

समय-सूची का निर्माण सामाजिक सर्वेक्षण की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण चरण है। सामाजिक सर्वेक्षण में समय तत्व बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। केवल व्यय के सम्बन्ध में ही नहीं अपितु समय के सम्बन्ध में भी पूर्वानुमान, अध्ययन कार्य में सफलता प्राप्ति के लिए आवश्यक है। सामाजिक समस्याओं का सर्वेक्षण करने में यह आवश्यक होता है कि सर्वेक्षण कार्य निर्धारित समय के अन्दर हो जाये क्योंकि कोई भी अनुसंधानकर्त्ता अनिश्चित काल तक अपना अनुसंधान कार्य चलाता रहें, यह उसके लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण से लाभप्रद नहीं होता और व्यय का आकार भी बढ़ता जाता है।

8. निदर्शन का चुनाव

निदर्शन का चुनाव सामाजिक सर्वेक्षण के आयोजन का प्रधान अंग है। सामाजिक सर्वेक्षण में सूचना प्राप्त करने के दो तरीके है, एक तो यह कि समुदाय की प्रत्येक इकाई का अध्ययन अलग-अलग व्यक्तिगत रूप में करके सूचना प्राप्त की जा सकती है और दूसरा तरीका यह है कि समुदाय की कुछ ऐसी इकाइयों को चुना जाये जो कि सम्पूर्ण समुदाय का प्रतिनिधित्व करती हो। इस प्रतिनिधि इकाइयों के अध्ययन से प्राप्त सूचना सम्पूर्ण समुदाय की विशेषता मान ली जाती है। सामाजिक सर्वेक्षण के समय और साधन की सीमितता तथा विस्तृत क्षेत्र होने के कारण यह सम्भव नहीं होता कि प्रत्येक इकाई का अलग-अलग अध्ययन किया जा सके। इसीलिये प्रायः प्रतिनिधि इकाइयों का ही अध्ययन किया जाता है। इन प्रतिनिधि इकाइयों का चुनाव ही निदर्शन का चुनाव है।

9. अध्ययन पद्धति का चुनाव अध्ययन

पद्धतियों का चुनाव किसी भी सर्वेक्षण की आधार शिलायें हैं। जितनी अधिक उपयुक्त अध्ययन पद्धति होगी उतना ही अच्छा सर्वेक्षण होगा। सामाजिक सर्वेक्षण में कई अध्ययन पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है। किन्तु एक सर्वेक्षण विशेष में निश्चित रूप से सर्वेक्षणकर्त्ता किस अध्ययन पद्धति को अपनायेगा, यह सर्वेक्षण के आकार प्रकार, धन की मात्रा, समय कार्यकर्त्ताओं की उपलब्धि इत्यादि पर निर्भर करता है। सर्वेक्षण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व यह निश्चित करना आवश्यक है कि अध्ययन प्रत्यक्ष अवलोकन होगा अथवा अप्रत्यक्ष सूचना प्राप्ति के लिए अनुसूची का प्रयोग ज्यादा सुगम होगा या प्रश्नावली का साक्षात्कार का प्रकार तथा प्रकृति क्या होगी ? इन सब बातों का निश्चय पहले ही कर लेना पड़ता है।

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10. अध्ययन के उपकरणों का निर्माण

सर्वेक्षण की अध्ययन पद्धतियों के चुनाव के पश्चात् अध्ययन यन्त्रों के निर्माण का क्रम आता है। सर्वेक्षण संगठन की “यन्त्र निर्मात्री उपसमिति समस्या से सम्बन्धित सभी प्रकाशित अथवा अप्रकाशित सामग्री को प्राप्त करके उसके आधार पर तथा वर्तमान सर्वेक्षण की प्रकृति के आधार पर उचित अथवा उपयुक्त अध्ययन यन्त्रों जैसे प्रश्नावली अनुसूची साक्षात्कार, मापक पैमाना इत्यादि का निर्माण करती है।

11. कार्यकर्ताओं का चुनाव तथा प्रशिक्षण

कार्यकर्त्ताओं का चुनाव सर्वेक्षण आयोजन का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। सर्वेक्षण कार्य के कुशलतापूर्वक सम्पन्न होने के लिये यह आवश्यक है कि क्षेत्रीय कार्यकर्ताओं का सर्वेक्षण कार्य में उचित चुनाव तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण प्रदान किया जाये। सर्वेक्षण कार्य की सफलता बहुत कुछ इन्हीं कार्यकर्ताओं की लगन, परिश्रम तथा योग्यता पर निर्भर करती है। इसीलिये इन कार्यकर्ताओं का चुनाव बड़ी ही सावधानीपूर्वक करना चाहिये।

12. पूर्व परीक्षण तथा पूर्व सर्वेक्षण

अध्ययन पद्धतियों तथा अध्ययन उपकरणों का चुनाव कर लेने तथा कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षण देने के बाद यद्यपि सर्वेक्षण का वास्तविक कार्य शेष रह जाता है किन्तु फिर भी सर्वेक्षण कार्य में अधिकाधिक सफलता प्राप्त करने हेतु उपकरणों की उपयुक्तता तथा कार्यकर्ताओं की योग्यता की परीक्षा कर लेनी चाहिये।

13. अध्ययन-साधनों का वितरण

समस्त अध्ययन साधनों का निर्माण तथा परीक्षण और पूर्वगामी सर्वेक्षण करने के बाद सर्वेक्षणकर्ता को वास्तविक कार्य के लिये अध्ययन क्षेत्र में भेजने की आवश्यकता होती है। अध्ययन क्षेत्र में उसे अकेला ही नहीं भेजा जाता है बल्कि उसे साधनों से युक्त करके अर्थात् माल-मसाले सहित भेजा जाता है जैसे स्टेशनरी क्षेत्रीय मानचित्र, कलम, गोंद, कैमरा, टेपरिकार्डर, कागज, पिन, पैड, स्केल आदि।

14. समुदाय को तैयार करना

उपरोक्त सभी कार्यों के साथ-साथ सामग्री संकलन प्रारम्भ करने के पूर्व समुदाय के लोगों को सर्वेक्षण हेतु सूचना प्रदान करने के लिये तैयार करना भी आवश्यक है। समस्या से सम्बन्धित वास्तविक सामग्री तथा तथ्यों की प्राप्ति, क्षेत्र में रहने वाले लोगों से ही होती है। सर्वेक्षणकर्त्ता उस क्षेत्र के लोगों के लिए बिल्कुल नया तथा उनसे अपरिचित होता है। इसलिये एक अपरिचित व्यक्ति को लोग सूचना देने में कई कारणों से संकोच करते हैं या डरते हैं। समुदाय के लोगों के मन में इस संकोच या भय की अनुभूति को नष्ट करके उनमें विश्वास की भावना को जागृत करना, सर्वेक्षण की सफलता के लिये अत्यन्त आवश्यक है।

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15. तथ्यों का संकलन

सर्वेक्षण का आयोजन पूर्ण होने के पश्चात् सर्वेक्षणकर्ता वास्तविक क्षेत्र में प्रवेश कर अपना कार्य प्रारम्भ करता है। इसी क्रिया को तथ्यों का संकलन कहते हैं। तथ्यों का संकलन सर्वेक्षण का प्रमुख कार्य है। इन तथ्यों का संग्रह साक्षात्कार पद्धति अवलोकन तथा अनुसूची इत्यादि पद्धतियों के द्वारा किया जाता है। क्षेत्र में रहते हुए सर्वेक्षणकर्त्ता के लिए यह आवश्यक है कि वह सही तथ्यों को प्राप्त करने के लिए उस क्षेत्र के सूचनादाताओं से अधिक घनिष्ठ सम्पर्क करें, जिससे उनमें सर्वेक्षणकर्त्ता के प्रति किसी भी प्रकार का सन्देह न होकर विश्वास की भावना जागृत हो जाये और वे समस्या से सम्बन्धित सभी वास्तविक तथा यथार्थ सूचनायें देने के लिए तत्पर हो जायें।

16. तथ्यों का वर्गीकरण तथा सारणीयन

तथ्यों का संकलन करने के पश्चात् इस एकत्रित सामग्री का वर्गीकरण किया जाता है। सूचनाओं को आँक लिया जाता है। जो सूचनायें महत्वपूर्ण होती हैं। उन्हें सारणियों में सजा दिया जाता है। तथ्यों के वर्गीकरण से तात्पर्य बिखरी हुई सामग्री को भिन्न-भिन्न श्रेणियों में व्यवस्थित करना होता है अर्थात जो भी सामग्री कार्यकर्ता ने एकत्रित की है वह बिखरे हुये रूप में होती है। अतः उस बिखरी हुई सामग्री को विभिन्न श्रेणियों में विभक्त करके संक्षिप्त रूप देना सर्वेक्षणकर्ता का प्रमुख उद्देश्य होता है।

17. तथ्यों का विश्लेषण तथा निष्कर्षीकरण

तथ्यों के वर्गीकरण तथा सारणीयन के पश्चात् तथ्यों का विश्लेषण किया जाता है। सामग्री के विश्लेषण से तात्पर्य प्राप्त तथ्यों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन एवम् तुलना है अर्थात् विभिन्न तथ्यों की तुलना तथा इन विभिन्न तथ्यों में पाये जाने वाले सह सम्बन्धों के आधार पर ही सामग्री का विश्लेषण किया जाता है और उसी विश्लेषण के आधार पर सामान्यीकरण अथवा निष्कर्षीकरण किया जाता है।

18. रिपोर्ट का निर्माण व प्रकाशन

सर्वेक्षण प्रक्रिया का अन्तिम तथा महत्वपूर्ण चरण प्रतिवेदन का निर्माण तथा प्रकाशन है। इसका प्रमुख उद्देश्य अध्ययन के सम्पूर्ण निष्कर्षो से सम्बन्धित व्यक्तियों को अवगत कराना होता है। रिपोर्ट का निर्माण तथा प्रकाशन यद्यपि सर्वेक्षण पूर्ण हो जाने पर ही होता है। तथापि रिपोर्ट का आकार स्वरूप, अन्तर्वस्तु आदि की योजना पहले ही बनानी पड़ती है। रिपोर्ट की भाषा शैली सरल और स्पष्ट होनी चाहिए किसी भी बात को बार-बार दोहराने की प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिये, सूचनाओं और तथ्यों में एक-एक तर्कयुक्त क्रमबद्धता होनी चाहिये, रिपोर्ट में तकनीकी शब्दों का प्रयोग जितना कम हो उतना ही अच्छा है।

किसी भी सर्वेक्षण कार्य को आरम्भ करने से पूर्व उपरोक्त प्रत्येक चरण पर विचार करके योजना बना लेना आवश्यक है। सर्वेक्षण की योजना जितनी सही, व्यावहारिक तथा उपयुक्त होगी उतनी ही सफलता सर्वेक्षण कार्य को सम्बन्धित करने में मिलेंगी अर्थात् उतने ही सुविधाजनक ढंग से सर्वेक्षण कार्य को संचालित करना सम्भव होगा, और सर्वेक्षण कार्य बीच में ही अधूरा छूट जाने की सम्भावनायें कम हो जायेंगी। सर्वेक्षण की योजना की व्यावहारिकता सर्वेक्षण की सामर्थ्य योग्यता तथा दूरदर्शिता इत्यादि से ही निश्चित होती है। सर्वेक्षण की योजना लचकदार होनी चाहिये जिससे समय व परिस्थिति के अनुसार उसमें आवश्यक परिवर्तन व परिवर्द्धन किये जा सकें। इस प्रकार सर्वेक्षण की सफलता के लिये समस्या के चुनाव से लेकर रिपोर्ट के निर्माण व प्रकाशन तक की योजना सर्वेक्षण कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व ही बना लेनी चाहिये।

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shubham yadav

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