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Pituitary Gland in Hindi पीयूष ग्रंथि किसे कहते है?

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Pituitary Gland in Hindi पीयूष ग्रंथि किसे कहते है?

Pituitary Gland in Hindi पीयूष ग्रंथि किसे कहते है?

अनुक्रम (Contents)

Pituitary Gland in Hindi पीयूष ग्रंथि किसे कहते है?

पीयूष ग्रंथि (Pituitary Gland)

यह कपाल की स्फेनाइड (Sphenoid) हड्डी में एक गड्ढे में स्थित होती है। इसको सेल टर्सिका (cell turcica) कहते हैं। इसका भार लगभग 0.6gm होता है। इसे मास्टर ग्रंथि के रूप में भी जाना जाता है। बड़ी और गर्भावस्था में काफी बड़ी होती है। इस ग्रंथि में मुख्यतः दो पालि (Lobes) पाये जाते हैं।

पिट्यूटरी ग्रंथि से स्त्रावित हार्मोन

1.पश्च पालि (Posterior Lobe)अथवा न्यूरो हाइपोफाइसिस

  • वेसोप्रेसिन
  • ऑक्सीटोसिन

2.अग्रपालि (Anterior lobe) अथवा एडीनोहाइपोफाइसिस

  • STH-सोमेटोट्रॉफिक हार्मोन
  • GTH-गोनेडोट्राफिक हार्मोन
  • ACTH-एड्रिनोकार्टिकोट्राफिक हार्मोन

TSH-थाइरॉइड प्रेरक हार्मोन

  • LTH-लूटियोट्रोफिक हार्मोन
  • डायबैटोजेनिक हार्मोन
  • MSH-मिलैनोसाइड प्रेरक हार्मोन

3.मध्यपालि (Intermediate Lobe)

पश्च पालि (Posterior Lobe)-

पश्च पालि से दो हार्मोन उत्पन्न होते हैं-

(i) वेसोप्रोसिन तथा (ii) ऑक्सीटोसिन।

(i) वेसोप्रोसिन अथवा एंटिडाइयूरेटिक हार्मोन-

ADH अथवा पिट्रेसिन ADH वृक्क की वाहिनियों एवं कोशिकाओं में जल के अवशोषण को नियन्त्रित करता है और जल-अवशोषण को बढ़ाकर मूत्र के आयतन को कम करता है। इसी कारण इसे मूत्ररोधी या एंटीडाइयूरेटिक कहते हैं। इसकी कमी होने पर मूत्र के साथ पानी की अधिक मात्रा निकलने लगती है जिससे मूत्र पतला व रुधिर गाढ़ा हो जाता है। इससे रुधिर दाब कम हो जाता है। इस रोग को मूत्रलता या डाइयूरेसिस (diuresis) कहते हैं इसे उहकमेह (diabetes insipidus) रोग भी कहते हैं। जिससे बार-बार पेशाब आता है और शरीर से अत्यधिक पानी निकल जाता है। इसकी अधिकता होने पर मूत्र गाढ़ा व रुधिर पतला हो जाता है तथा रुधिर दाब बढ़ जाता है।

(ii) आक्सीटोसिन (Oxytocin) या पिटोसिन(Pitocin)-

यह गर्भावस्था के अन्तिम काल में गर्भाशय की दीवार की अनैच्छिक पेशियों के संकुचन को प्रेरित करता है अर्थात प्रसव के समय गर्भाशय के फैलने तथा प्रसव के पश्चात गर्भाशय के सिकुड़ने को प्रेरित करता है। यह स्तनधारियों में दुग्ध-स्त्राव को उत्तेजित करता है।

अग्रपालि (Anterior Lobe)-

यह पूरी पिट्यूटरी ग्रंथि का तीन चौथाई हिस्सा बनाती है। इस भाग से स्रावित हार्मोनों के स्राव को हाइपोथैलमस नियंत्रित करता है। अधोलिखित हार्मोन इस भाग से स्रावित होते हैं। यथा-

(i) STH-सोमेटोट्रॉफिक हार्मोन (Somatotropic Hormone)-

यह शरीर की वृद्धि, विशेषतया हड्डियों की वृद्धि का नियंत्रण करती है। STH की अधिकता से भीमकायत्व (gigantism) एवं एक्रोमिगली (acromegaly) विकार उत्पन्न हो जाते हैं, जिसमें मनुष्य की लम्बाई सामान्य से बहुत अधिक बढ़ जाती है। STH की कमी से मनुष्य में बौनापन (dwarfism) होता है।

→ बौनापन (dwarfism)-बाल्यकाल में GH के कम स्राव से व्यक्ति बौना रह जाता है। इस बौनेपन को एटीलिओसिस (ateleiosis) तथा इन बौनों को मिगेट्स (midgets) कहते हैं।

→ अतिवृद्धि (Gigantism)-बाल्यकाल में GH की अधिकता से बहुत लम्बे तथा हृष्ट-पुष्ट भीमकाय (giant) व्यक्तियों का विकास होता है। इन्हें पिट्यूटेरी जायंट कहते हैं।

→ अग्रातिकायता (acromegaly)-वृद्धिकाल के बाद GH की अधिकता से गोरिल्ला के समान कुरूप भीमकाय (disproportinote giants) व्यक्ति बनते हैं। क्योंकि हड्डियों की लम्बाई में वृद्धि सम्भव नहीं होती तो शरीर लम्बाई में तो बढ़ नहीं पाता अतः हाथ, पांव, चेहरे के कुछ भाग, जबड़े आदि अधिक लम्बे हो जाते हैं। हड्डियाँ मोटाई में बढ़ती हैं जिससे शरीर व चेहरा भद्दा हो जाता है। आँखों के ऊपर व गालों की हड्डियाँ उभर आती हैं। इस अवस्था को एक्रोमीगैली कहते हैं।

→ कभी-कभी कशेरुक दण्ड के झुक जाने से व्यक्ति कुबडा हो जाता है। इसे काईफोसिस (kyphosis) कहते हैं।

(ii) G.T.H. हार्मोन (Gonadotropic Hormone)-

ये हार्मोन नर में वृषण एवं मादा में अंडाशयों को उत्तेजित करते हैं। ये लैगिक परिपक्वता तथा लैगिक कार्यों की पूर्णता के लिये अति आवश्यक हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-

(a) फॉलिकिल उत्तेजक हार्मोन (Follicle stimulating hormone FSH)-

यह मादा में अंडाशय के फॉलिकिल्स की वृद्धि तथा अण्डों के निर्माण को प्रोत्साहित करता है एवं मादा हार्मोन एस्ट्रोजन (esterogens) के स्राव को प्रेरित करता है। नर में शुक्राणुओं तथा शुक्रजनन नलिकाओं का निर्माण इन्हीं के द्वारा प्रेरित होता है।

(b) ल्यूटिन प्रेरक हार्मोन (Luteinzing hormone-LH) अथवा अन्तराल-कोशिका प्रेरक हार्मोन (Interstitial cell stimulating hormone-ICSH)-

स्त्रियों में यह हार्मोन थीका इण्टरना कोशिकाओं को एस्ट्रोजन (esterogen) तथा प्रोजेस्ट्रोन (progesteron) नामक हार्मोन के स्राव के लिये प्रेरित करता है, अण्डोत्सर्ग की क्रिया को प्रोत्साहित करता है तथा ग्रेन्युलोसा एवं थीका इण्टरना कोशिकाओं के ल्यूटिनीभवन को नियंत्रित करता है। एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्ट्रॉन मादा की माहवारी को नियन्त्रित करते हैं। नर में ल्यूटिन प्रेरक हार्मोन वृषण की अन्तराल कोशिकाओं (interstitutial cells) या लेडिग की कोशिकाओं को टेस्टोस्टेरोन (testosterone) नामक हार्मोन के स्राव के लिये प्रेरित करता है जिसके द्वारा अतिरिक्त जनन अंगों तथा द्वितीयक लैंगिक लक्षणों का
नियमन होता है। शुक्राणु-जनन पर भी इसका प्रभाव होता है।

गोनेडोट्रॉफिक हार्मोन के स्त्राव का नियन्त्रण-यौवनावस्था से केवल 2-3 वर्ष पहले ही इनका स्राव शुरू होता है। हाइपोथैलेमस में स्थित जैनेटिक जैव घड़ी (genetic biological clock) इनके स्राव के समय को नियन्त्रित करती है।

• मादा में LH तथा FSH की कमी होने पर अण्डाशय का आकार क्षीण होता जाता है, फॉलिकल्स विनष्ट हो जाते हैं और गर्भाशय तथा योनि लुप्त हो जाते हैं।

• नर में इसकी कमी से जनन-तन्त्र विनिष्ट हो जाता है, वृषण पिलपिले तथा अनियमित आकार के हो जाते हैं और सेमिनिफेरस नलिकाएं नष्ट हो जाती हैं। युवावस्था में वृषण उदरगुहा में ही रह जाते हैं। इस प्रकार के नर क्रिप्टोर्किड (cryptorchid) कहलाते हैं।

(iii) ACTH हार्मोन (एड्रिनोकाटि-कोट्राफिक हार्मोन)-

यह ऐड्रीनल ग्रन्थि के कॉर्टिकल भाग से हार्मोन के स्राव को प्रभावित करता है। इसकी कमी के कारण ऐड्रीनल ग्रन्थियां विनष्ट हो जाती हैं तथा इसकी अधिकता से रीनल कांटेक्स की वृद्धि अधिक हो जाती है।

(iv) TSH हार्मोन (थाइरॉइड प्रेरक हार्मोन)-

इसे थाइरोट्रोपिन हार्मोन भी कहते हैं। यह भी LA और FSH की भाँति एक ग्लाइकोप्रोटीन होता है। थाइराइड ग्रन्थि की वृद्धि एवं स्रावण क्रिया का प्रेरक होता है।

(v) LTH हार्मोन (लूटियोट्रोफिक हार्मोन)-

इसे लैक्टोजेनिक हार्मोन अथवा प्रोलेक्टिन भी कहते हैं। यह हार्मोन गर्भित मादा में दुग्ध-निर्माण एवं स्राव को प्रेरित करता है। यह कॉर्पस ल्यूटियम से प्रोजेस्ट्रॉन नामक हार्मोन के स्राव को प्रेरित करता है। इसकी कमी से मादा में दुग्ध-निर्माण नहीं होता।

(vi) डायबैटोजेनिक हार्मोन (Diabetogenic hormone)-

यह कार्बोहाईड्रेट के उपाचय को प्रभावित करता है तथा इसका प्रभाव प्रोटीन एवं वसा पर भी होता है। इसका प्रभाव इंसुलिन के ठीक विपरीत होता है।

(vii) M.S.H. हार्मोन (मिलैनोसाइट प्रेरक हार्मोन)

इसका स्राव मध्य पिंड से होता है किन्तु मनुष्य में मध्य पिंड के अल्प विकसित होने के कारण इसका स्राव अग्र पिट्यूटरी से ही होता है। निम्न कशेरुकी प्राणियों में यह हार्मोन त्वचा की कोशिकाओं में मिलेनिन रंग के कणों को फैलाकर त्वचा के रंग को गहरा करता है।

मध्य पालि (Intemediate lobe)-

मानव में यह पालि अविकसित होती है।

तो दोस्तों, शायद अब आपको “Pituitary Gland in Hindi पीयूष ग्रंथि किसे कहते है? , का कांसेप्ट अच्छे से समझ आ गया होगा, यदि कोई डाउट हो तो आप कमेंट या मेल के माध्यम से अपना डाउट क्लियर कर सकते हैं|

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shubham yadav

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